समाज का अत्याचार | Samaj Ka Atyachar

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Samaj Ka Atyachar by शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय - Sharatchandra Chattopadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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समाज का अत्याचार ३१ लिये तैयार हो रही थीं ।----ुउउस ओर के दृश्यों पर कस्मात उस के देखते देखते एक काला पदां पड़ गया। सदसा समन की ओर उस की दृष्टि गई । रमन उसके सुख की तर 'ध्यान से देख रहा था । विजली ने आंखे नीची करलीं । और देशो पर शांचल डाल लिया । रमन ने कदा--- “मै कव जाङ'गा 1 --“कहां जाओगे ? तुस्हारे माता-पिता कहां रहते हैं । उन्हें खुचना देनी होगी । इन दिनो में तो इतनी बड़ी बात की झोर ध्यान तक नहीं गया । तुर्हारे माता-पिता कहां रहते हैं । में झभी आदमी भेज दू ।” मेरे माता-पिता जीवित नहीं हैं । में एक अनाथ बालक हू | < -ण“तो और कौन है ? बताओ ।” “मेरा और कोई सो नहीं” । इस खंसार में ऐसा कोई मजुष्य नहीं जिसे मे अपना समझू ” । --““कहा रहतेथे।ः “क्या वत्ता ? आज तीन दिन हये इस शहर मे आया था | मेख घर गाओ सें है ।” ------ “यहां केसे आये ? ओर उस दुकान पर तुम्दारा क्या काम था ।यद्द बताओ तो ? रमन कुछ देर तक चुप पड़ा रहा उस के सुख से कोई बात न निकली । बिजली उसी ओर दृष्टि जमाये रमन को धयान से देखती रही-----इस खुन्दर और भोले चेहरे पर दुर्भाग्य ने कसी गहरी काल रुकीर खच दी हे।




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