सिन्धु सभ्यता का आदि केंद्र हड़पा | Sindu Sabhyta Ka Aadi Kendar Hadpa

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Sindu Sabhyta Ka Aadi Kendar Hadpa by आचार्य श्री रामलालजी - Aacharya Shri Ramlalji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्थिति तथा इतिहास ३ इसमे खेती वोना श्रारम्भ कर दिया है श्रौर ्रव इन खडह्रो कै भ्रास-पास श्रसख्य लट- लहाते खेत दिखाई देते हैं । दो सहस्र वपं पहले इस प्रान्त की पर्कात श्रौर यहाँ के निवासी प्राय ऐसे ह थे जैसे कि श्राजव ल देखने में श्राते हैं । इसका प्रमाण महाभारत के कर्णदल्य-सम्वाद प्रकरण मे, जहां वाहीक-निवासियो के गुर कर्म स्वभाव श्रौर देगप्रकृति का विस्तृत वर्णन न्यां गया है, मिलता है” । वहाँ लिखा है कि यह देश जड, पीलु श्रौर करीर के वनों से ढका हुमा था श्रौर वहाँ के निवामियो का स्वभाव चौरी करना, मद्य पीना गोमास ग्रीर लहसुन खाना श्रादि धा । जलवायु--^लोग्ररवारी-दोग्राव' नदर खुदने से पहले पजाव का यह भाग जी श्रव मटगुमरी जिले के श्रन्दगत है चिरकाल तक एक उजाट श्रौर ऊपर प्रदेश था । ब्रिटिदा राज्य के श्रारम्भमेजो यूरोपीन श्रधिकारी इस जिले मे नियुक्त होते थे वे १ सम्भव है कि यह प्रान्त जिसमे हडप्पा के खढहर विद्यमान हैं प्राचीन मद्रदेग के श्रन्दर्गत था । इसकी राजधघानी शाकल (वर्तमान स्यालकोट) रावी श्रौर चमनाव के मध्य में थी । महाभारत में इस प्रान्त के निवासियों का नाम 'वाहीक' लिसा है। सिकदर महान्‌ के श्राक्रमण॒ के समयये लोग “कठी' कहलाते थे श्रौर श्राजकल इनका नाम 'काठिया' है । व ये लोग अपने को मुसलिम राजपुत कहते हैं श्रीर हडप्पा के श्रास-पास रावी के त्ट पर श्रावाद हैं। स्वभाव से ये उपद्रवी श्रौर भगडालू हैं । २ तासा किलावलिप्तानां निवसन्करुरुजागते 1 कद्चिद्दाटीक दुप्टाना नातिहुष्ट-मना जगौ ।। ना तरून वृहती गौरी सुकष्मकम्वलवासिनी । मामनुस्मरनी नेते वाहीक कुरुवासिनम्‌ ॥ तद्रू नु कदा नीर्स्वात्ता च रम्यामिरावतीम्‌। गत्वा स्वदेदा द्रक्ष्यामि स्वून जवा शुभा सिय ॥ मृदगानक्ञखाना मदलाना च निस्वने 1 खरोप्टराव्वतरेदचैव मत्ता यास्यामहे सुखम्‌ ॥ शमीपीलुकरीराणा वनेपु सुखवत्मसु । भ्रपुपान्सक्तूपिण्डांश्च प्रादनन्तो मविनादिन्तान्‌ ॥ गव्यस्य तृप्ता मान्य पीत्वा गौड सुरानवम्‌। पलाण्टु-गदूप-दतान्‌-कादन्ती चैडकान्धहूवु ॥ -महामारत, कणं पर्वं, ४४, १५-२८ 1




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