श्रीमदयानंद प्रकाश | Srimadyanand Prakash

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutSwami Satyanand Ji Maharaj
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
560
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about स्वामी सत्यानन्द जी महाराज - Swami Satyanand Ji Maharaj
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)छठभोग्प पदों की महाएंता दिनोद्िन धदतों थी चलो जा रही £ैं, निस
निसारियों का कातर क्रलन दिराम-विध्यमपिददीन होने लग गया दे।श्री स्वामौगी यह भी जानयैये कि मारत-मुमि रान-्यर्मा दै, सुझझ्ा,
सुला दै । उमर नहीं, किन्दू उस्दंरा घौर सस्ययालिनी है । इस पर पादार-
योगय मामा धान्य उव दोन ई! इ पर सुस्वादु पलो श एटि भी नही ६।
भोजन, चाम्दुदूम पौर प्यवदार के योग्य सव यस्तु यहां ष्पद होती ६ । चो
फिर माना षसुन्परा द्पनौ सन्तान फा लाचन-पालन कयो नटो कर सकती १
सरे शादते छके-वाने भूः के म इसकी गोद में देटे पिल्लप-विलख कर
भाद-चाट् न् ¶्योरोरदेट१छप केभरभोष्ठा उसर महपिंने श्रष्द रह समम लिया था । उतकी दिव्य
दृशि पे नित्य फे धकाल के कारणों का दुरे रहना सवया ग्रमम्भ्व या | वे तानते
थे कि भूमि की उप्र में मेद नहीं पदा, किन्तु हु डे पूद्धि दो गई दो सो कोई चाश्रयं
नहीं । फिर थी यहां भू र चौर दुर्भि ६, मो इसका कारण शिदपकला षा
भारी अभाव है। आवश्यकोय ब्यवदार की परतुय यहाँ निर्मित गर्दी होती ।
विदेशी चस्तुदों को भरमार से यहां के कारों परिश्रम निरुस्मे दो रे हैं । उनके
पाम झाजीडिका कर कोई उपाय नहीं रद्द । पदले साधारण परिष्टियठि के मनुष्य
से लेकर मद्दाराजों और राजे भ्वरों तक इसी देर के यने वस्तरों से वेश-विन्याम करते
थे, यहाँ ऊँ रान-जटित चौर मणि-सुक्-एवित श्रामृपणों से विमूपित होते ।
उमके श्रााश-मेदो मयम दसो दे के हतकम्मी दिशवकम्माधिो के दवारा बनाये
जाति । उनकी सुसलित करने के लिए भारत को चिश्रशाजाधों के पिशारों ही
से थदूमुत चिप्र प्रा हो जति । परन्तु शान सथ कदु पिपरी हो गया है ।महारा, बूम वक्त को भो नि, श्रपने भाप को भ्याख्याने-मवन की सुलों
शको से पार कर देनेमें हो अपने दुर-दित की सम्पदं मसा महं मानने
थे । वे परम कर्म-योगी थे, इस कारण क्रियास्सक कमें करना थाइते थे । उनके
जीवन के श्रन्तिम दर्पौ तं, उनके धर्म॑-प्रचार प्रौर समाज-मुधार झादि उदास
उश्यों में, भारंतबंध में रिदपकलज्ा का विस्तारित करना मी सम्मितित दो गया
था 1 वे इसके लिए पूं भ्रयटन कर् रद थे । उन्दोंने पते पश्चिमी शिष्य 'वीस
महाशय म क्षिसा था ङि शाप भारतवासियों को शिदपनकला सिखाने का प्रबंध
कीनिए 1 मदारान के पग्र के उसर में जर्मन देश निवासी शोमानू जी,ए. बीस ने
User Reviews
No Reviews | Add Yours...