कबीर और जायसी का राश्यवाद और तुलनात्मक अध्ययन | Kabir Aur Jaysi Ka Rahsyawad Aur Tulnatmak Adhayan
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
360
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( २६ )एएमपेछा्ता० एमाण्णषड में इन श्नुभूतियों का वर्णन करते हुए .
लिखा है--“उपनिषदों में चार प्रकार की रहस्यानुसूतियाँ विखरी मिलती हैं,
जिनका सम्बन्ध क्रमदाः रूप, रंग, शब्दे श्रौर प्रकाश से है ।”1हमारी समभ में उपनिपदों में केवल चार प्रकार की रहस्यानुभूतिरयां
ही नहीं मिलती है वरन् चे उन समस्त प्रकार कौ रहस्यानुभूतियो का
कोप है जिनकी किसी भी रहस्यवादी ने कमी भी श्रनुभृति की होनी ।
यहाँ पर हम उपयुं वत चार प्रकार की रहस्यानुमूत्तियो का परिचयकराकर कुछ श्रन्य प्रकार की रंहस्यानुभूतियों का संकेत कर श्रपने मत
की पुष्टि करेंगे । रूपाकार-सम्बन्धी श्रनुमूतियो कौ चर्चा “श्वेताश्वतर
उपनिपद्' की निम्नलिखित पंक्तियों में की गई है--' 'योगन्साधना करने पर उस ब्रह्यःकी श्रतुमूति नीहार, धूम,
सूये, श्रगनि, -वायु, जुगनू, विजंली, स्फटिक श्रौर चन्द्र के रूप में हुश्रा
करती है 12 इसी प्रकार श्रवरन्द्रिय से सम्बन्धित अरनुभूतिरयां मी मिलती
हैं । वृहदारण्मकोपनिपद्' मे शब्द रूप मे ब्रह्यानुभूतियों का वर्णन : इस` प्रकार किया गया है--
शब्द, पचने-क्रिया श्रौर भोजन-क्रिया का परिणाम 'है। कोई
भी मनुष्य इनं श्रपनी ररा वन्द करके: सुन सकता है किन्तु जवं१ “णपः € म क्ल 6०९९ ण ४४९ तोह : 6 0 99
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