प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचारधारायें | Prachin Bhartiya Rajnitik Vichardhara

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना [हे । यह साघारण सा ग्रन्तर है और दोनों ग्रन्थों की मूल विनारघारा के मत्तभेद का चोनक नहीं है । भ्रधवा याज्ववल्कयस्मृति तथा चुकनीति ने न्यायालयों की जो सुची दी हैवह एक ही है। दूसरी घोर कौटित्य झर्थास्त्र ने न्यायालयों का जो वर्णन दिया है उससे ऐसा होता है कि वह रन सुचियों से भिन्न है, परन्तु ध्यान थे इसने पर श्ञातत होगा कि दोनों में झ्रपराल-सम्बन्धी तथा अन्य घन-सम्बन्धी विवादके लिये पृथक न्यायालयों का वर्णन है तथा दोनों में सर्वोच्च रीति से न्याय का कार्य राज्य के ही पास है । अत्त: दोनों में प्रमुख अन्तर कोई नहीं है । केवल कौटिलीय अ्र्यशास्त्र के वर्णन में स्थानीय न्यायालयों की परम्परा का प्रमुख रीति से वर्णनकिया गया है तथा भ्रन्य दोनों ग्रन्थों में जात्तीय न्यायालयों की परम्परा को । इस प्रकार यह ग्रन्थ यद्यपि भिन्न भिन्न प्रकार के न्यायालयों का वर्णन करते हैं परन्तु एक दूसरे से मतभिननता नहीं रखते । ः भारतीय विचार-मतलसूत सिद्धान्तों पर श्राघारित--इन सभी ऑ्रघिकृत ग़न्थों के धिचारों की एकात्मता का समुल कारण, जैसा ऊपर चताया गया, यह है कि सभी विचारकों के विचार का प्रारम्भ कुछ सुल-भूत तत्वों से हुआ है श्रौर उन तत्वों के ब्राघार पर फ्रमणः रेखागशिित के वद्धिगत सिद्धान्तों के समान एक बढ़ती हुई पद्धति का निर्माण किया गया है । जो मूलभूत त्तत्व हैं उनको सभी भारतीय विचारकों ने रखागण्णित के स्वयंमान्य सच््यों (8#2ं0ा05) के समान ही स्वयंसिद्ध तथा सर्वकालिक माना है । इसलिये उसके ्राघार पर निर्मित इस सम्पूर्ण समाज और राज्य रचना को भी उन्होंने सर्वकालिक ही माना है । श्रतः सभी मान्य भारतीय ग्रन्थ, चाहे फकिसी भी काल में लिखे गये हों समान रूप से उसी एक पद्धति क! (उसके श्रेष्ठ मानने के कारण) वर्णन करते हैं तथा यह भी आग्रह करते हैं कि समाज श्रौर राज्य हारा उसी को माना श्रीौर उसी का पालन किया जाय । भारतीय विचार में यह भी माना गया है (जैसा ऊपर बताया गया) कि यह श्रावारभूत तत्व संसार से श्रलिप्त तथा स्रिकालदर्णी ऋषियों द्वारा श्रनुभूत हैं श्रौर उन्होंने हो स्वयं उन तत्वों के झाघार पर यह व्यवस्था खड़ी की है, ्रत: इसमें मतभेद होने का कोई कारण नहीं । सच ग्रन्थों की पारस्परिक मतभिन्‍नता के श्रतिरिक्त कुछ लोगों ने मोटे तौर पर यह भी सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यहाँ पर घमंशास्त्रों श्रौर श्र्थणास्त्रों की परम्परा हीं भिन्न है तथा एक पारलौकिक है आर दूसरा लौकिक ग्रर्थात्‌ एक में जहाँ घ्मे को भ्रमुख मानकर उसके श्रनुसार विचार किया है वहाँ दूसरे प्रकार के ग्रन्थों में धर्म को हृत्व न देकर वर्त मान पद्चिमी विचार के समान केवल सांसारिक चुद्धि से तथा सांसारिक जीवन को ही प्रमुखता देते हुए विचार किया गया है । परन्तु श्रथंशास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों को (कौटिलीय, कामन्दकीय तथा शुक्र) हो देखने के परुचात्‌ यह आम स्वाभाविक रूप से मिट जाता है । यह सभी ग्रन्थ भी मोक्ष का विचार सम्मुख रखते हुए वर्णाश्रिम व्यवस्था का वर्णन करते हैं तथा धर्मशास्त्रों के समान उसी व्यवस्था के झन्तर्गत राज्य व्यवस्था को विकसित करते हुए धर्मशास्त्रों के सभी नियमों को




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