नाट्य दर्शन शोध कृति | Naty Darshn Shodh Kriti

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Naty Darshn Shodh Kriti by शान्तिगोपाल पुरोहित - Shantigopal Purohit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सद्छृत नाटकों की उत्पत्ति एव उनदा श्रालाचनात्मक विवरण ७ मे मृत्य व नटां की प्रवानता तो नाव्यशास्त्र वें मगलावरण से ही प्रतिपादितं होती है। वहा ब्रह्मा के साथ नटराज शिवजी को भी नमस्वार क्या गया है।” इत्स स्पष्ट है कि नृत्य प्रटान बरने के वारण ही भरत के लिए शिवजी नादव सिखाने बलि ब्रह्मा के समान ही पूजनीय बन गय 1 डा० मनमोहन घाप का कयन हैक अय प्रथा मे ब्रह्मा के साय शिवजी का बहुत दम वार नमसदार जिया गया है 1 * निप्कर्ष दस प्रकर एक मत नट धानुका शृ का विक्रमिन रूप मानता हे एवं दूसरा नाय्य त्रश्ममिनय का स्वयभ्‌ तयाग्रपनमेपूणा सममता है। दूसरा मत नाय्य का उदगम नट धातु स मानता है झार नृत्त व नृत्य का कालान्तर मे सम्मिलित हमा घोपित करता दै किन्तु प्रस्तुत प्रवव क॑ लेसक को यह प्रतीत हाता है कि लोक्-जीवन म वृत्त व नृत्य प्रचलित थ श्र स्वय भरत शिव का नृत्य नाव्याभिनेष स पूव देव चुके थ।” अत नृत्य भरत द्वारा प्रतियादित नाव्य से पहिते घिद्यमान था । लाक जीवन म भरत से पूव अभिनय का होता भी अवश्यमावी ही है ।* यहा यह निश्चित रुप स नहीं कहा जा सकता वि लाक जावन म नृत्य ने नाट्य को जप दिया श्रथवा नाय्य से नृत्य की उतत्ति हुयी । समवत वे ग्रदुकरणात्मक प्रौर श्रानद उपभोग कै प्रवत्तियां से सहारा प्राप्त कर भ्रागे व> श्रौर भित मिनक्षेनाम प्रगति कर गय । हा, साहित्यिक नाटका म भरत मुनि क॑ नाव्यशास्थर व आधार पर बहा जा सकता हैं कि नृत्य को श्रभिनय बे पश्चात्‌ स्थान मिला । प्रतएव निष्कप मे रुप मे निवदन है कि नाटय व नाव्य शब्दा का श्सिनयायक नट धातु से व्युत्पन् मानले. म ब1ई भ्रापत्ति दृष्टिगाचर नटी हाती है मौर लोक॒ जीवन म प्रचलित गृत्त व दत्य का सार्हित्यिक ताटका म कालान्तर म ही स्यान प्राप्त हुमा ऐसा प्रतीत होना है । भ्राजता नाघ्य श~ म अ्रथत नृत्य तथा नाटक दाना दही समाविष्ट रहत है । नाटक समीन व्य काय व्यापार तथा कविता की सवतोमुली कला के स्प म स्वीकार दिया जाता है 1 नाटक श्रौर रूपक आाज हा नाटक रूपक का प्रयाय वन गया है । वास्तव मे शारवांय इष्टिस ना० शा० (डाब्घोष) पृ १ वहो चही 'छ--४९ देखिये प्रयम प° 1 भारतीय माटय साहित्य पर १। बी ८ + ८७ ^ ~




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