ब्रह्मसूत्र शंकरभाष्य रत्रप्रभा | Brahmasutra Shankrabhashya Ratrprabha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| ११ विपय पष्ठ परुक्ति वेय एकदै, तो भी सगुण वियाक्रा येद्‌ मानना चाहिए [सिद्धान्त] २१३३ - ८ शब्दके मेदसे विदययाका सेद्‌ क्यों माना जाता है ? ४६; २१३४ - ५ विकल्पाधिकरण ३।२।३४।५९ [ ए० २ ४२, २ ध्वे अपिकरणका सार $ ७ 4 २१३८ - ६ मू्र--विकल्पोऽविदि्टफलत्वात्‌. ३।३।३४८।५९ =. कश २१३९ - १ विद्याओंका समुचय र [पवेपत्त] ४ ,.. २१३९-८ वरियाओंका समुचय नदीं हे, परन्तु विकर हं [सिद्धान्त] ... २१९४० - १० काम्याधिकरण २।२।३५।९० [ प्र° २१४२--२१४४ | ३५ अधिकरणफा सार ... 0 ... २१४२ - १७ सूत्र--काम्यास्तु ययाकामम्‌० ३।३।२५।९० ह | २१४२ - १ प्रतीक उपासनाओंमं यथेष्ट विकरप या समुचय ६ ,., २१४३ - १२ यथाश्रयभावाधिकरण २।२।२६।६१-६६ [ प° २१४५ --२१५४ | ३६वें अधिकरणका सर 44 क ४ २१४५ - ६ सुन्न--अभेपु यथाश्रयभावः ३1३1३ ६1६३१ व ५ २१४५ - १२ कमोद्ध उद्रीयमें आधित उपासना समुचयसे होती दै ... २१४६-२ सूत्र--रिष्टेथ ३।३।३६।९२ « 94 २१४५ ~ १ स्तोत्रके समान आश्रित उपासनाएँ तीनों वेदोंगें दोती हैं. ... २१४७ - ७ सूत्र-~-समादटायत्‌ ३।३।३६1६ ३ न मत २१४८ - ) होव्रपदनाद्धेवः श्त्यादिस भी उक्त उपासना्ओंका समुश्चेय ज्ञात होता ,,, + .. २१४८-७ सन्र--सुणतसाधारण्यश्रतश्च ३।३।३ ६।६४ ध २१४९ - १६ तेनेयं चयी विद्याः इत्यादिसे तीनों बेदोमें साधारणतया ओंकारका श्रवण है ,,, 2 ... २१४९ - २५ सूच ~~न वा तत्सद्‌ भावाश्रतः २।३।२३६।६५ - +, २१५१ ~ १ आश्रित उपासनाओंका समुचय नहीं होता दै [ सिद्धान्त ] २१५१ - १२ सूत्र--दशन्व ३।३।३६।६६ „.. (8 २१५३ - १९ उपासना्मोका अखहभाव भ्रति दिखलाती है ;,. -२१५४ - १ तृतीय भध्यायके चतुथपाद्का प्रारम्भ क कः २१५५ ~ १ पुरपथषिकरण ३।४।१।१-१४ [ प० २१५५-- २१८३ | {म भयिकरणका सार कः ,. मी १५५ - ८ सृत्र--गुसपाथाऽतः शब्दादिति चाद्रायण: ३।४।१।१ ।. ,«,.. '.. २१५६-१




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