रत्नाकर शतक | Ratnakar Shatak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३ )खातक निभतिभ्रों कौ शलो से मिन्न है । इसमे मगवान कौ स्तुति करते हुए श्राव्मतत्व का निरूपरा क्रिया है ।जिस प्रकार शारीरिक वल के लिए व्यायाम की श्रावइ्यकता होती है, उसी प्रकार झात्मिक शक्ति के विकास के लिए भावों का च्यायाम श्रपेक्षित है । शान्त रस के परिपाक के लिए तो भावनाओं की उत्पत्ति, उसका चेततन्यां्च, उनकी विकृति एवे - स्वामाविक रूप मे परिणति की प्रक्रिया विदष भ्रावदयक है, इनके विदलेषण के चिना-गान्तरस का परिपाक हो ही नही सकता है । मुक्तक पद्यं में पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह श्रन्विति रक्षा मात्र के लिए ही होता है । कवि रत्नाकर ने श्रपनी भावधारा को एक स्वामाविक तथा निश्चित क्रन से प्रवाहित कर श्रन्विति की रक्षा पूणरीति से की है। सुक्तकपद्यों में घुघली श्रात्म मावना के देन न होकर ज्ञाता, हप्टा, शादवत, निष्कलंक शुद्ध बुद्ध श्रात्मा का साक्षात्कार होता है। कवि के काव्य का केन्द्रविन्दु चिरन्तन, झतुपम एव अक्षय सुख प्राप्ति ही है । यह रलन्रय की उपलब्धि होने पर ऑआत्मस्वरूप में परिणत हो वृत्ताकार बन जाता है ।इस दत्तक की भाषा सस्कृत मिश्ित पुरातन कन्नड़ है । इसमें कुछ शब्द श्रपभ्र श श्रौर प्राकृत के भी मिश्रित है । कवि ने इन दाव्द रूपों को कन्नड़ की विभक्तियों को जोड़कर श्रपने श्रनुक्षल ही चना लिया है । ध्वनि परिवतन के नियमो का कविने संस्कृत से कन्नड शब्द वनाति मेँ धुरा उपयोग किया है । दन्तं ग्रौर तद्धित प्रत्यय प्राय: संस्कृत के ही ग्रहण किये है। इस प्रकार भाषा को




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