समय सार | Samya Saar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९-१० १११३श१६-१८* विषयानुक्रमाणिका *जीवामीवाधिकारपुष्यबंधकारक मंगलाचरण, समयसारग्रंयरचना को प्रतिज्ञा और प्रत्य का प्राभाय्य । स्वसमय ओर फरसमय का स्वरूप ।समयभूत अनन्तधर्मात्मसक सभी दब्य एकक्षेत्रावगाहो होनेपर भी अपना अस्तित्व बनाये रखते है । जोवद्रब्य भी समयभूत अनन्तधर्मात्सफ स्वतंत्र द्रव्य होनेसे उसके बंध होसें का प्रतिपादन निशष्चयनय को दृष्टि से मिध्या है और सौ कारण उसका द्ेविव्य सही बनता |आत्मा फे रागादिपावों से रहित एकत्व की प्राष्ठिकी दुलभता।जिसको स्याद्वादविद्या के द्वारा, यूक्तियों के हारा, गरुजनों से प्राप्त ज्ञान के हारा और अनुभवजन्यज्ञान के द्वारा अभेदरत्नश्रय दे रूप से परिणत हुए मिध्यात्व दागादि- रहित आत्मा का दर्शन करामेकी आचार्य प्रतिज्ञा करने हे ओर उस आत्मदर्डान कोस्वानुभवप्रत्यक्ष के द्वारा फ्रीक्षण करके प्रमाणभूत मानना चाहिये एसा कहते हं ) शुढदव्यायिकनय की दुष्टिसे मात्मा से प्रमत है और न अप्रमस । वह सिषं ज्ञापकमावरुप हो है ।व्यवहारनय को दृष्टि से यद्यपि ज्ञानी आत्मा रत्नत्रयात्सक है तो भी निस्चयनय की दृष्टि से बहु सिर्फ ज्ञाता ही है-वह न ज्ञान है, न चारित्र है और न दर्शन है । यद्यपि शुद्धनिदचयनय की दृष्टि से आत्मा ज्ञायकभावरूप है, दर्दान-झाब- चारित्ररूप नहीं है तो भी छोकों को समझानेके लिये दर्शन-सात-'चारित्ररूप सेदों का अबलंब लेना आवश्यक होनेसे परमा्थ॑प्रतिपादक स्यवहारनय मनुसरणीय है । ष्यवहार परमार्थ का प्रतिपादक होमेसे आत्मत्रष्य को सिद्धि करता है ।शुद्धात्मा का जो अनुभव करते हं उने दृष्टि से ष्यवहारनय अनुसरण के योग्य सहीं है और जो शुद्ध आत्मा के स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकते उनकी दृष्टि से ब्यवहारनय अनुसरण के योग्य है । व्यवहारनय अभूतार्थ है ओर कथंचित्‌ भूतायं भो है । शुद्धनय भूतायथ है । जो भूताथ का आश्रय करता है बह हो सम्पर्दृष्टि होता है ।विज्ञामरुप घुद्धत्मह्वरूप का अनुभव फरनंघाल को दृष्टि सें दद्धनय प्रयोजसवान होती है और जो जीव अभेदरत्नश्रय के रूप से परिणत हुआ सहीँं होता-सराग- सम्यादृषिटि होता है उसके व्यवहारनय या अशुद्ननिवचयनय प्रयोजनवान्‌ होती है । पयार्यरूप से जानं गये नवयदाथं सम्यक्त्व का कारण होनेसे सद्भूतव्यवहारनय की दृष्टि से सम्यक्व हे मोर सात्मस्वरूपानुभृति शुद्धनय कौ दृष्टि से प्म्यक्स्वरूप हि । जो भस्मा को द्रष्यकमं मौर नोकमं से अस्पृष्ट, नरनारकादिपययों मे अभिन्न, सधी भवस्याथ मं अवस्थितं मौर भावकम रहित वेखता है -मनुभव करता है वह शुद्धयः है अयवा सुद्ध जलात्मा की अनुभूति हि शुद्धनय हैं ।शुद्ध आत्मा के अनूभष से उसको जानरूपता ही अनुभव में आती है ।थो नात्मसाधमा करना चाहता है उसको व्यचहारनथ से सम्यग्दशनशानचारित्र का ही निरंतर सेचन करना चाहिये; क्यों कि मिश्चस्यन को दुष्टि से रत्नजय आात्मकप ही(1व्‌. हें.११६ १४११५५ १६०१६४ १६७१७५१७९१८४१८८१९४२०१३२२१ २२७




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