हिंदी साहित्य सम्मलेन | Hindi Sahitya Sammelan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
559
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)1 हमारे झरोर को रदना {अन्वयहैं; परि अन्तर चहुत्त हो थी रे-घीरे पढ़ाना या घटाना होता हूँ तो पंच (र )
से काम लिया जाता हूं; जहाँ से साफ साफ दीखता हैं उसी अंतर पर
घस्तुताल को रखते हूं । बड़ी नली के भीतर एक नली और होती
हूँ; इसी में चकुताल लगा होता है । इस नलो को उपर सरकाने से
चुत स्तर बस्तुताल काप यन्तर अविक किप जा सकता हैँ । प्रकादा
(1.४) रौ किरणें झोझे (फ1717007) पर से उचट कर मंच फे चरि
मे से होती हुई वस्तु पर पड़ती हूँ । वस्तु से उच्च कर चस्तुताल आर नली मौर
चलूताल मं होती हई परोक्षङू को चु मं पहुचतो हं । शीशेसे प्रकादा कम
गप अधिक किया जा सकता हैइस यन्न की सहायता से बैज्ञातिको (5८[<घ. (४१४) नें अनेक प्रकार की
सुषम (फततएप6) चनस्पतियों को देखा हैं जिनको साधारण मनुष्यों ने
न कभी देखा और न सुना । साधारण मनुष्यों को सो इस वात के सुनने
से भी बडा आश्चर्य होता है कि जीवधारी इतने सुदम भी हो सकते है
जो अलो सेन दिशा दे; परन्तु हस विषय मेँ सन्देह करना व्यर्थ हूँ यदि आप
इस बघंत्र के द्वारा चस्तुओ कोौदेखना जानतो ननको भी इस चात का
पूर्णं विश्वास हो जायगा ।
जिस प्रकार वनस्पतिवर्ग में अनेक प्रकार के बड़े से बड़े और छोटे
से छोटे व्यक्ति हैं. उसी प्रकार प्राणिवर्ग में भी जिन्न-भिघन पकार के बड़े
से बडे और छोटे से छोटे च्पक्ति हूं । बड-चड़े प्राणी ऐसे जैसे कि हाथी,
डेट, वा समुद्र में रहने बाली ह्लेल (५४11८) मछली, मनुप्य, बानर, कबूतर
जादि, छोटे-छोटे ऐसे जैसे कि मकसी, मच्छर, जू, चीटी सादि । प्राणी इनसे
भौ छोटे-छोटे होते दै ; ये बहूधा जल मे रहते हं मौर आंसो से केवल एक बिन्दू
जनं देष पडते हं
यदि जौर देख भाल की जावे तो ज्ञात होता हैं कि संख्य भरणी
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