अर्वाचीन राजनीतिक चिन्तन | Arvachin Rajnitik Chintan

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Arvachin Rajnitik Chintan by प्रभुदत्त शर्मा - Prabhudutt Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मार्क्स के बाद समाजदाद 1 पर्मादचारगाद : श्डवडं दंसंटाइन [ष्ल्णञण्यऽप : एवनधठ एलण्ञल०, 18501932) पुनविचारवाद (ए6भ5णणाऽप) पुनविचारवादियो हारा माकं के सिान्त कौ कटु झालोचना की गई श्रौर इस बात पर बल दिया गया कि मावसंवाद के क्रान्तिकारी पहलू की अपेक्षा विकास- वादौ पहलू पर बन दिया जाना चाहिए त्तया परिवदर्दित परिस्थितियों में मार्क्सदादी सिद्धान्तो मे श्रावश्यक्तानुसार सशोधन किए जाने चाहिए । यूरोप में पुर्विदार- वादियों झथवा सशोधनवादियों भ्ौर सुधार्दादियौ के इस उदार तथा व्यावहारिक समाजवाद के सिद्धान्त प्रथम विश्व युद्ध से 25 वर्ष पूर्व॑ विविघ विद्वानों जैसे, जमेंनी मे एडवड़ं वरदा इन (८५९६५ 8तापऽएटाण) , फ़रंस मे जोन जोरेस (168 280९5), वेत्जियम मे असीले (एतण्व्ात 4751616}, इटली मे विस्सोलाटी (८०५० 65००६}, खस मे टुयन बेरोनोस्की (7४६०० 82700514) ठया स्वीडन मे कालं दिग (1811 72०119६) के दक्तव्यों तया कायो मे ग्रौर्‌ बेल्जियम के मजदुर दल, दक्षिणी जर्मन राज्यों की समाजवादी प्रजातान्तरिक पार्टियों, क्रॉस की स्दतत्र समाज- बादी पॉटियों तथा द्रूसिस्टो (81005>510) दौर इटली की समाजवादी पार्टियों के सिद्धान्तो तया पुक्तियो मे प्रकट हए । इस सुधारवादी समाअवाद (राणा 50612157) के सिद्धान्त वर्टाइन जोरेस तथा टुगन बेरोनोस्की के लेखो एव रचनाओ में दिशदू रूप से उपलब्ध हैं दिन्तु इनमे भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बसेंटाइन ही हैं जिसे सशोधनवादी ग्रथवा पुरनर्दिदारवादी (ह८४1५1०१5६) श्रान्दोलन को प्रणेता कहा जाता है । दर्सटाइन ने माक्संवाद के विकासवादी पहलू पर वल दिया, मार्क्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तो को तथ्यों ब्ये. दृष्टि स दोधी पाया ग्रौर कहा कि मार्क्स के बुद्धिमान शिष्यों को अपने गुरु वो प्रत्येक दात को भाँखें बन्द करके स्वीकार नहीं करना चाहिए, बलिक इसमे जो सत्य है उसे ग्रहण करना चाहिए भ्ौर जो श्रसत्य है उसका परित्याग कर देना चाहिए । एडवडईं वसेटाइन (वण्ञाप ए6५१८य्छ} एडवर्ड दर्सटाइन का जन्म एन्‌ 1850 ये बलिन मे एक लोकोमोटिष इजीनियर कै परिदारमेहुभ्रा था । उसका सामाडिक जीवन सद्‌ 1872 में समाजवादी प्रजातान्त्रिक दल (50८18 6००62006 एव) कै सदस्यता से शुरू हुमा 1 सत 1878 मे जव समाजवाद विरोषी बालन पारित हुमा तो बसेंटाइल को जर्मनी से बाहर लगभग 20 वषं एक निर्वासित के रूप में व्यतीत करने पड़े । सन्‌ 1900 में जर्मनी लौटने पर उसने पुर््दिचारदादी शान्दोलन की बागडोर संम्माल ली शोर साशल डेमोक्रेटिक पार्टी के क्टु दिरोद के दावजूद युवकों को बडी सीमा तक प्रभावित किया । पुरन्विच्ारदाद के प्रति विरोध का नेता कॉट्स्की था । दर्सटाइन का सन्‌ 1914 तक उससे संद्धान्तिक संघर्ष चलता रहा । सन्‌ 1932 में इस महानु सशोधन- चादो नेता की मृत्यु हो गई 1




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