परवर्ती हिन्दी कृष्णभक्ति - काव्य | Paravarti Hindi Krishnabhakti Kavy

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Paravarti Hindi Krishnabhakti Kavy by राजेन्द्र कुमार - Rajendra Kumar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अनुक्रम भूमिका ‡ डँ विजयेन स्नातक ७-१० भ्रामुख ११-१७ अध्याय--२१ परम्परा ओर पृष्ठभूमि २५-५७ मध्ययुगीन-भक्ति साहित्य श्रौर कष्णचरित--कृष्ण चरित के ललित पक्ष को प्रधानता, पुराण सौर कुष्ण चरित, भागवत : कृष्ण-कान्य का आधार ग्रंथ, पौराणिक युग के उपरान्त धार्मिक गतिविधि, भक्ति का दक्षिणी- प्रवाह ओर आलवार संत, भक्त आचार्यो का आविर्भाव । कृष्ण भक्ति के प्रेरक सम्प्रदाय--रविस्दाके-दस्प्रदाय, वल्लभ-सम्प्रदाय, चेतन्य-सम्प्रदाय, राधावल्लभ-सम्प्रदाय, हुरिदासी-सम्प्रदाय, आलोच्य युग मे अविच्छिन्न परम्परा) युग-प्रवाहु--राजनीतिक गतिविधि, ब्रजप्रदेश पर प्रभाव, जाट ओर मरहठा शास्तन, उन्नीसवीं शती ओर नवीनचेतना का प्रसार, सामन्ती जीवन की छाया, सामाजिक और आर्थिक जीवन, धार्मिक वातावरण । साहित्गिण पृष्ठभुसि--पुर्ववर्ती प्रभाव की प्रक्रिया, काव्य-परम्पराएँ और उनका प्रभाव, संत काव्यघा रा, थ्रे माउणानक-करव्यघ् रा, रास-काव्यघा रा, लौकिक काव्धधाराएं | करुष्णभक्ति-कृव्य्‌ की परम्पर रोखहकी शती के पूवे, जयदेव कृत गीतगोविन्द, कृञ्णचरित के एबन्घात्मक यत्न, विद्यापति । हिन्दो कृष्णमक्ति-काव्य--सूर पूवं कष्ण-काव्य का प्रश्न, साम्प्रदायिक कुष्णभक्ति-काव्य, दस्परदाय-दुक्त छष्ण-कव्य । न दमन




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