सूक्तिस्तबक | Suktistabak

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Suktistabak by रघुनन्दन शास्त्री - Raghunandan Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सू ्कस्त्वक साधु कटावन कटिनटे, ज्यौ खरडकी धार। डगमगाय तो गिरि पर, निःचल उतरे पार ॥ 3 ॥ साधु कटावन कटिन दे, लेवा पेड़ खजूर । चढ़े तो चाखे प्रेम रस. गिरे तो चकना चूर ॥ ८ ॥ साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि । घन का भूखा जा फिर, सा तो साधू नाहि ॥ £ ॥ सिंहन के लेहड़ नहीं, हंसन की नहिं पांत । लालन की नटि वारियां. साधु न चले जमात ॥ १० ॥ वन वन नौ चदन नहीं, सूरगा का दल नादि सव समुद्र मानती नटी. य। साधू जग माद ॥ ९ ॥ ५५ ° ॐ 4 ० सै» भ चूच्छ कचरे न।ह फल भग्व. नदा न सच नोार | परमाग्थ के कारन, साघुन 'घरा सरीर ॥ १२ ॥ निराकार की आरसी, साधे ही की देह । लखा जो चाहे अलख को, इन ही में लखि लेह ॥ १३ ॥ नहिं सीतल है चन्द्रमा. हिम नहिं सीतल होय । कवीरा शीतल सत जन, नाम सनदी साय ॥ 5४ ॥ साध सती आओ सूरमा, ज्ञानी आओ गज-दंत। पते निकसि न वादहुरे, जा जुग जादि अनन्त ॥ १४ ॥ न क प्रम्-माक़ लगी लगन छूटे नदि, जीभ चच जरि जाय । मोखा कटां अगार मे, जादि चकार चवाय ॥ है ॥ ~ . ^ भ कः क कु ले भक्ति गद चं।गान की, भाव कोइ ले जाय ।




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