अलंकार - प्रवेशिका | Alankar Praveshika

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Alankar Praveshika by रघुनन्दन शास्त्री - Raghunandan Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अभिधा १३ नहीं वहां शब्द झपने शब्दत्व धर्म से शून्य होकर ध्वनिमात्र रह जायगा । अत प्रत्येक शब्द में अर्थ होता है । पर अथे को प्रगट करने का प्रकार सभी शब्दों में एक सा नहीं होता । कुछ सीधे साघे शब्द उच्चारणमात्र से निन्न अधे का बोध करा देते हैं । जेसे गो घर इस्यादि । पर कुछ शब्द ऐसे हैं. जिन से सीधा अथे न निकज्ञ कर कुड पेचदार अथे निकलता है ओर उनका अथे निकालने में सीधा अर्थ छोड़ कर कुछ ऊदापोह करना पड़ता है । जेसे किसी ने कहा -- वह बालक तो गधा है । अब यहां गघा का जो सीधा अथे पशु विशेष हैं वह तो बालक में घटता नहीं ्त कुछ ऊद्दापोह करके गधे जैसा मूख जड्बुद्धि थे लगाना पड़ता है। इन दोनों से भिन्न शर्थव्यक्ति का एक अर प्रकार है जहां शब्दों का सीधा साधा अर्थ रहते हुए भी कुछ ओर ही अथे निकाला जाता है । जैसे किसी विद्यालय के छात्र अध्या- पक से कहें -- श्रीमान्‌ जी घण्टी बज गई है । इसका सीधा अथे तो घण्टी का बजना है पर अध्यापक भट समझ जाता है कि अब इस श्रेणी को छोड़ कर दूसरी श्रेणी में चलना चाहिये । इस प्रकार शब्दों में झथेव्यक्ति की तीन मुख्य शक्तियां हैं जिनके द्वारा शब्द अभीष्ट अथ को प्रगट करने में समर्थ होते हैं । इनके नाम हैं--अभिधा लक्षणा और व्यज्नना । ( १) अभिधा __ शब्दों के सांकेतित थे (कोष आदि में निश्चित या व्यवददार १ सांकेतित अर्थ से अभिप्राय उस श्रर्थ का है जिससे शब्द के सुनते ही श्रोता के मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का संकेत सा बन जाता है । जब हम कहते हैं-- गौ तो एक विशेष प्रकार की शकल या चित्र




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