तेरापन्थ - आचार्य चरितावलि भाग - 1 | Terapanth - Acharya Charitavali Bhag - 1

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Book Image : तेरापन्थ - आचार्य चरितावलि भाग - 1  - Terapanth - Acharya Charitavali Bhag - 1
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका ` ११(१०) महान्‌ व्यक्तित्व :-आपके व्यक्तित्व के विषय मे हम जयाचार्यके ही उद्गारो को प्रकट करेगे :मुनिवर रे शीयल धरयो नवबाड सू रे, धूर बाला ब्रह्मचार हौ लाल ।ए तप उक्कृष्टो घणो रे, सुरपति प्रणमे सार हो लाल ॥मुनिवर रे उपरम रस मांह रह्या रे विविध गुणा री खाण हो लाल ।एकत्त कर्मं काटण भणी रे, सवेग रस गलताण हो लाल ॥मुनिवर रे स्वाम गुणां रा सागर रे गिरवो श्रति गम्भीर हो लाल ।उजागर गुण श्रागलो रे, मेरु तणी पर धीर हौ लाल॥मुनिवर रे कठिन वचन कहिवा तणो रे, जाण के लीधो नेम हो लाल ।बहुलपणे नहीं बागस्यों रे, वचनाम्ृत सू प्रेम हो. लाल ॥मुनिवर रे विविध कठिन बच सांभली रे, ज्यारे मन मे नही तमाय हो लाल ।तन मन वच मुनि बद्च कियो रे, ए तप श्रघिक श्रथाय हो लाल ॥मुनिवर रे चौथे श्रारे सांभल्या रे, क्षमा शूरा भ्ररिहत हो लाल ।विरला पचम काल मेँ रे, हेम सरिषा सन्त हो लाल ॥मुनिवर रे निरलोभी मुनि निर्मला रे, भ्रार्जव निर श्रहकार हो लाल ।हलका क्म उपधि करी रे, सत्य वच महा सुखकार हो लाल ॥मुनिवर रे सयम मेँ शूरा घणा रे, वर तप विविघ प्रकार हो लाल ।उपधि श्रनादिक मुनि भणी रे, दिलरो हैम दातार हो लाल ॥मुनिवर रे र्या धून भ्रति भ्रोपती रे, जाणे चाल्यो गजराज हो लाल ।गुण मूरत गमती घणी रे, प्रत्यक्ष भवदघि पाज हो लाल ॥मुनिवर रे स्वाम गुणा रा सागरू, किम कहिये मुख एक हो लाल ।उडी तुक्च श्रालोचना रे, बारू तुझ. विवेक हो. लाल ॥मुनिवर रे झ्खड श्राचार्य श्रागन्यां रे, तें पाली एकणधार हो लाल ।मान मेट मन वश कियो रे, नित्य कीजे नमस्कार हो लाल ॥साझ घणा सन्वा भणीरे, ते दीघो ्रधिक उदार हो लाल ।गण वच्छल गण बालहों रे, समरे तीरथ च्यार हो लाल ॥ (११) भाचार्यों के चहुमान के पात्र :--आपने तीन आचार्यों के--आचार्य भीखनजी, भआाचार्य भारीमालजी और आचार्य रायचन्दजी के युग देखें। आपको सभी का स्नेह एवं वहुमान प्रष्ठा]आपके दीक्षा लेने के भाव स्थिर होते ही स्वामीजी ने युवाचायं भारीणलजी से फरमाया :{देम नवरस - ७. ९-१६.९८.५४-२६




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