तबले पर दिल्ली और पूरब | Table Par Delhi Aur Purab

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Book Image : तबले पर दिल्ली और पूरब  - Table Par Delhi Aur Purab
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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त्तवले पर दिल्ली और पूरब १६परिणाम नहीं निकला । अतः ऐसे ताल-वाद्य की आवश्यकता हुई, जिस पर कि चाँटी का काम संगति के अनुरूप सुगमतापूर्वक किया जा सके 1 । है =वत स्थिरता का प्रभावतत्कालीन युग में भारत की राजघानी दिल्‍ली विलास और वैभव का केन्द्र बनी हुई थी । समस्त वायुमण्डल रजोगुणपूर्ण बन गया था । आध्यात्मिक जीवन“चर्या से मनुष्य के हृदय में जिस गम्मीरता और स्थिरता की सृप्टि होती है तथा प्रवृत्ति सत्तोगुण सम्पन्न-रहती है, चह्‌ जीवनं यदि राग~रं ` तथा प्रणय-कीड़ागौं मे बदले जाए, तो वृत्ति-चांचल्य का बढना स्वाभाविक ही हौ जाता दै । मुगल शासको के दरबारी कलावंत भौ जीवन की वास्तविकता से हटकर जिन्दगी की रगीनियों के गुलाम वन गए \ बादशाह को भसन्न करके उसका छृषापात्र वनने के लिए सभी ने जी-तोड परिश्रम किया। किसी ने चादशाह्‌ को शायर प्रसिद्ध क्रिया, तोकिसी ने गायक] किसी ने चाददाह के नाम की छाप डालकर हजारों खयालों की स्वना कर्‌ डाली, जिनके ्वंसावशेष आज भी स्व० भातखण्डे-लिखिंत पुस्तकों मे मौजूद हैँ ।नायक-नायिकाओं के प्रचार से लोगों के हृदयों से गम्भीरता और स्थिरता का लोप होने लगा मौर चंचलता उत्पन्न हो गई । इस चंचलता का प्रभाव घुवपद-घमार गायन्‌-क्ंलो पर भी पर्याप्त रूप में पडा, फलस्वरूप इस गायकौ मे मे गम्भीरता का वास होने लगा । प्रुवपद-धमार की गायकीमे से गाम्भीये निकल जाने पर उसका वास्तविक रस समाप्त ही हो जाता है, औौर ऐसा हुआ भी !„ म्द के नाद में गाम्मीर्यं एवं स्थिरता का प्राधान्य है ! इस वाद्य भ यदि किसी भकार चांचस्य उत्पन्न मौ कर दिया नाए, तो निस्सन्देद इसका वास्तविक रस नष्ट हो जाएगा । मृदंग मे चंचलता उत्सन्न करने के लिए उसका गुह्‌ छोटा कर दिया जाए, पुडी पर स्याही कम रखी जाए त्या उसके चाटीवाले स्यान को पतला कर दिया जाएं । दरस परिवर्तेन का परिणाम यह होगा कि मृदंग दीप के स्वर में मिलने सगेमा, किन्तु नाद-खोल छोटी ठोलक के समान रखना पड़ेगा, क्योकि




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