जैन मित्र | Jain Mitra

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Jain Mitra  by गोपालदास वरैया - Gopaldas Varaiya

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about गोपालदास वरैया - Gopaldas Varaiya

Add Infomation AboutGopaldas Varaiya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
८१७ जेनमित्र. ` २. समस्त पाठशाखावोका कों ९क प्र | श्रावकाचारादिक ग्रथ सान्वयाथै पडायै अहक (170९५५० ) नही है. जति हैं. जिससे कि विद्यार्थी तथा अध्या- ब॒ ६. समस्त पाठशाछावोंकी देखरेख करने- पक इन दोनोंको ही बहुत कुछ कठिनता सेकेखिये कोई एक इन्संपेक्टर नहीं हैं. पड़ती है. इसकारण अबके महासमाके रि ४. भारतवर्षभरमें कोई भी ऐसी पाठशाला | अधिवेदानपर समस्त पाठ्यालाओंके अ- सनही हे कि निसमें जैनधघर्मसंबंधी उच्श्रणीकी | ध्यापक तथा-प्रबंधकर्त्ता ओंसे मेठेपर ध विद्या पढाई जाती हो. पधारकर सवसहमत तथा अनुकूल क्रम ३. १. विद्यार्थागण स्वलपविद्याम्या्त करके ही | निर्णय करनेकी प्रेरणा की जाती हैं आशा ह आगामी विद्याम्यासको छोडकर अपने २ | है कि समस्त महाशय इस आवशइ्यकीय र रोजगारधंदेमें लग जाते हैं कार्य्यकी प्रेरणासे गाफिल महिं रहेंगे. है, योग्य अध्यापकॉंकी हमेशाह अप्राति है. पाठकमहाशय ! इस विषयमें हम मी इन छदद कारणोंसि पाठ्शालावोंका फल | अपनी टूटी फूटी सम्मति छिख़ते हैं ¦ इष्टिगोचर नं होता. यदि इन ( उन्नति- | आशा है किः आप निष्पक्षष्टिसे विचार ¡ के ) मतिर्वेधक कारणाको दूर करनेका । करेंगे. ¦ उपाय क्रिया जाय तो आदा ६ कि। हमारी रायमें पाठ्शालावोंके तीन भ- | शी ही हमारे अभीष्ट फर्की सिद्धि हो ! द होने चाहिये-अर्थात्‌ एक तो वार्बो- | = ३ [1 | क क क सक्ती है. | घ पाठशाला दूसरी प्रवोशिका पाठशाला, ` अब इन कारणॉपर किंचित विचार आर तीसरा विद्यालय. किया जाता है. | प्रथमकी बालबोधपाठशालामें _ वर्ण १. प्रथम तो समस्त पाठशालावोंमें प- | मालासे लेकर विद्यार्थियोको इतना विप- ढाईका क्रम एकसा नहीं हैं. सो ठीक नहीं है ¦ य अभ्यास करादिया जाय करि जिससे क्योंकि जबतक ससरत पाठशाछावोंमें प्रवेदिका खंडकं रत्नकरंडश्रावकाचारादि पढाईका क्रम एकसा नहिं होगा तबतक ! ग्रेथीको पढानेमें अध्यापक तथा विर्धाथि- परीक्षा आदिकके प्रबंधमं बहुत कुछ ! योंकी किसीप्रकार मी कठिनता नहिं पड़े. गड़बड़ पड़ती है. इसकारण सहझक्रमकी | और जबतक विद्यार्थी बालवोध परीक्षाके अत्यंत आवश्यकता है. इस विषयमें अनक ¦ समस्त विषयोंमें उतीर्ण न हो जाय पाठशालावोंकि अध्यापक तथा प्रबंधकत्ता- | तब तक उस विय्यार्थीको प्रवेशिका पाठ* आओंका सबसे बडा उजर यह है कि प्रथम | शाठाकी पढाईमें सामिठ न किया जाय. ही प्रथम पढनेवाले बालकॉोको व्याकरणका | इस पाठदयालाकी परीक्षा लिखित प्रश्नों - बोध तो है नहीं और उनको रत्नकरंड | द्वारा नहिं होनी चाहिये किन्तु परीक्षाठ-




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now