गेरुआ बाबा | Geruaa Baba

[adinserter block="2"]
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
30 MB
कुल पष्ठ :
111
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)गेर्धा वावा ` १५0बाबा जाकर बैठे तो उसने पूडा--“्ापने फोकनी से बात
चीत की है ?”
गे०--'हाँ, जो कुछ पूछना था,सो तो पूछ लिया !”'
बु०--तो जवाब पाकर झापने उसको कैसा समा है ?”
गे०--ुभते वो छोड़ी बेकसूर मालूम हुई !”
बु०--'तब गहने से बह हीरा केसे गिर कर उसकी कोटर
में जा पड़ा ?'
गे०--“थ्रापको हीरा की बात पहले से डी साउम है क्या”
बुल--“मैं इसी हीरे की बात नहीं साहब यहुतसी बारनजानती है। किसी से कहा नहीं, आपको गंसीर आदमी देख
कर कहती हूँ । ब्योक्ति यह खव बातें पहले से जाहिर हो जानें
यर् अखल चोर खबरदार हो जायगा झोर माल भी न सिलेगा
उस सनीचर की रात वड़ी अयाचनी थी ¡ फंकनी उस अँघेरे
में किसी मद से बात करती थी । जरा दूर थी, इससे में सब
बातें तो नहीं समझ सकी लेकिन मद की. दो- एक वाठ सुनने
में आइ । चह कहता रहा कि प्यारी 'की कौन खिड़की' बगीचे
की ओर खुली है ।'इसके वाद कुछ देर तक बुढ़िया चुप रदी। गेरुझा बाबा
ने कहा--''सब बातें कह जाव, रुकती क्यों हो ?”बुदिया वोली- “उसके बाद की वतं तो समभ मे, ठीक
नहीं आई' । लेकिन एक श्र मामला में बतलाती हूँ, जिससे
| मालूम होगा कि दोनो किस गरज् से वहां अँधेरे में फल थे चहशक
User Reviews
No Reviews | Add Yours...