गारिब | Garib

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
66
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)गरीब [ १३]
एसल०--( अपनी ही घुन में ) हाँ, और यह ध्यान रहे--पत्थर
के अक्षर दो इंची से कस मोटे न हों । ताकि सव श्रंसानी से पद्
सकें । समभे, दो इंच मोटे ।
सब--( सिर नवाकर ) जी, सवा दो! केसी बात कह
रहे हैं आप ? (जाते हैं )
त्रिलो०--( प्रवेश कर, स्वतः ) यहाँ वष-गॉठ मन रही है ।
उधर मेरे नौनिहाल की जीवन-गाँठ खुली जा रही दै । विधाता !
क्या तय किया है तूने ?
यातो दरिद्रतां की उवाली से अब बचाले।
या एक दम जलाद्, तिल-तिल जलाने वाले ॥
( स्वगत वैरो की श्रोर इशारा करते हुए ) बढ़ो, आगे बदो,
वैभव के द्वार तक पहुँचो ।
सुनानी है वहाँ करुखा जनक दुर्भाग्य की गाथा 1
सुकाना स्वाथ के चरों में अपना श्राज है माथा ॥।
जिया ! तू क्यों काँप रही है ? वाणी तू क्यों मूक दो रही
है १ भिमक, संकोच को छोड, अभय होकर भीख माँग ।
विधाता ने यदीलिक्ा दहै इस एूटे.मुकदर में ।
दिया था जन्म इसही वाध्ते धन-दीन के घर में ॥
ल०-(द्पंके साथ) कौनदै?
त्रिलो०--( दीनता पूवक ) एक रारीब, बदनसीब ।
ल०--( तेज़ी से ) किस लिए श्राया है यहाँ ? किसने श्राने
दिया तुमे ?
त्रिलो०-( गिडगिडाते हुए ) दया की भीख मांगने श्राया
हूं । गरीब--पदरेदासों ने रदमकर श्राने दिया है सेठजी ! नाराज
न द्रूजिषए !
मुसीबत से घिरा हूँ, तंग दस्ती का सताया हूँ ।
मदद हो जाय कुछ इस ही लिए चरणों में श्चाया ह ॥
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