स्याद्वाद मन्जरी | Sayadvad Manjari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४ , अथर अंगकोर ११ ५ केकेति सिमिस से को आरेदाही धियो दाक छीर शौर, मेद धूते धिकार भारि दर्षी 'की कतेक चोषणः शतारं आरे शगवमके सिद्धातॉका अभधिकाशिक प्रचार किया । जाँ विज्ञाओंकि समुद्र थी और अपने असामान्य जिधानवेमवक कारण कलिकालसबकि ताम ५ नै थे । मल्लियेन हेमचन्दका पूज्य दृष्टिसे स्मरण करते हैं और उन्हें बार विद्या सबझी साहित्य करनेमें साक्षातू श्रह्माकी उपमा देते हैं । सिद्ैमशन्दातुशासमके अतिरिक्त हेमधन्द्ने तक साहित्य ही कल योग नोति आदि विधिष विषयोपर अनेक प्रयोकी रचना करके जल साहित्यकों पत्लविद़ बनामा । “कही लाता है कि कुछ मिलाकर हमभन्दने साढ़ तीन करोड़ कठोकॉको रचना की है । हेमचल्के मुख्य ग्रथ ति अकाः 2--- १ विद्ध्हैमकछस्शानुशाषने ( अ ) अचम सात अष्यादो मे संस्कृत व्याकरण £ ( था ) मठे कध्यायम प्रकृत एव अपन्न स्याकरण २ दभाश्पमहाकाभ्य { माषङृत अहटिकाष्य के नादर्श पर ) {अ ) सस्त इपाश्चथ ( आ ) प्रात द्वाव १ शोष ९ अ) मभिषानवितामणि-सबृत्ति ( हैमीवाममाला ) ( भा ) अनेकार्थसग्रह [ई ) देशोनाममाला-सबुत्ति ( रयणावल्ति ) ( ई ) निघटशेष हैं अलकार काव्यानुशासन-सबूत्ति ५ शवे छदोनुशासन-सवूलि इ स्वाय (ज ) प्रमाममीमातसा [ बपूर्णं ] ( बा ) भन्योगन्धवन्छेदिका ( स्याद्टाद्मजरौ ); (इ) भयोगग्यवच्छेदिका ७ बोग योगदास्त्र-संबुत्ति ( अध्यार्मोपतिषद््‌ ) ८ स्तुति. बोतरागस्तोत्र ९ चरित निवष्टिशलाकापुरुचरित इस प्रम्योंके अतिरिक्त हेमचस्द्रमे और भी प्रंथोका निर्माण किया है । हेमच द्र मारतके एक देदीप्यमान र थे उनके बिंगा जैन साहित्य ही नही गुजरातका साहित्य शन्य समक्षा आयमा । अन्ययोग ओर अयोगव्यवनच्छेद दाप्रिधिकायं दानिक निच्ार्तेको षस्त पर्चौम प्रस्तु करनेकी पद्धति भारववर्षमे बहुत समयसे चली जाती है । इषम भारतीय साहित्ये सर्वप्रथम विज्ञानवादो वोद आलार्य बसुबघुदारा विज्ञासवादकी सिद्धिके छिये बीत दलोकप्रमाण विशिका और तीस दलोकप्रप्राण त्रिशिकाकी रचना देखमेम आती है । जैन याहित्यमे सर्वप्रथम सुप्रसिद्ध जैन दारांनिक सिद्धसेम दिवाकरने हाशिवादुद्रार्तिशिकाओंकी रचसा की । हरि मदमे भी विश्च सिरविशिकाओंको लिखा है । हेमचम्दनें सिद्धसेनकी द्ार्थिशिकाओंके अनुकरण पर सरल आर मामिक्र भाषामें अन्मदीगव्यवच्छेद भीर अयोगव्यवच्छेद नामकी दो दार्निशिकांऑओकीो “चना की है । न्नव ई एक धिद्धानूने इस ग्याकरणको पशसा निम्न द्कोकसे की थी- आत सबूणु पाणिनीमलपित काततककथा वृधा मा क्षीं कटशाक्रटायनेवच भद्र चाण क्रिमि । कि क्ण्ठाभरणादिशिनठ रयत्मात्सानमन्पैरपि अयम्ते मदि सवदर्थमभुदा थीसिद्टेमोक्तम' ॥। जने सांदित्यसों इतिहास पृ ९४ | श, शिशो सिये देखिये अकाक्षल निभाष भारत सरकार नई दिलले हारा प्रकाशित दोनेवाली “मारतके कदि सग्दूठ' पुस्तक सेंशक को आर्य हेमेपन्द्र नामेक निर्व |




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