रेन अँधेरी | Rain Andheri

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Rain Andheri  by मम्मधनाथ गुप्त - Mammadhanath Gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भिलनी तो दूर रही, उसके छोटें-से घर की शान्ति भी, थानी जिसे वह शान्ति (1 समने की श्रभ्यस्त थीं, विध्वश्त हो गई थी ।. उसका पति जो अबतक या तो उसका था या उन पुस्तकों के ढेर का. था, जिनके प्रति वह;कितनी भी ईर्ष्या का उससे छिन गया है । कम से कम वह दूर हो गया है, इसमें कोई सन्देह नहीं ।. तो नहीं थी, पर अब दी यद्यपि तीनों की श्रां जेल के फाटक की श्रोर लगी हुई थी, पर झ्रभी एक अ्रनुभव करे, वे उन्हें घर से बाहर नहीं ले जा सकती थी, पर्‌ अव वह पतिभी वह पुस्तकों में इषा रहता था, तो उसने श्रपनी पत्नी के विरुद्ध कोई शिकायत ही जेल-कमंचारी एक तरह से चुपके से ही यह बता गया था कि झभी उनके छूटने ` ह मे कख देर लगेगी, क्योकि कई तरह की खानादुरियां करनी पडती ह, जिनमे ।.. देर लग ही जाती है। रूंपवती ने जेल के फाटक की श्रोर देखते हृएस्यामासे | कहा, “तुम जबसे गई, तबसे तुम्हारी कोई खबर नहीं मिली पुन भर _ सुधारने के लिए कहीं । इयामा ने कुछ भंपकर उत्तर दिया, “मैं बराबर चाचाजी से पत्र-व्यवहार करती रहती हूं ।” ल्‍ {+ दोनों श्रोताओं के लिए यह खबर एक बम की तरह थी । वह पत्रों में क्या ` लिखा करतीथी ? उधरसे क्या उत्तर झाता था। रूपवती का चेहरा उसके । भ्रनजान में ही कड़ा पड गया । बोली, “हू” फिर सोचकर बोली, “रसा मालूम होता है कि उनके छूटने में घंटा दो घंटा लग जाएगा ।' राजेन्द्रश्यामा से कुछ पुना चाहता था, पर क्या पूष श्रौर किस प्रकार :.. पछे यह उसकी समभ् में नहींश्रारहाथा । उसके मा-बापने द्यामा कोडसके । लिए व चुना था, बाद. को विचारों की एकता के कारण इसपर ग्रौरष्प्प लग गया था, पर जब श्यामा घर छोडकर यहां तक कि रूपवती का घर छोडकर ` पता नहीं त्रिलोचन के यहां या किसके यहां रहने लगी, तब फिर ऊषादेवी ने ही ~~ उसे मान भी लिया था । कसे यह सब हुश्रा, यह राजेन्द्र की समभ में नहीं झा. यह स्थिति इतनी भ्रखर रही थी कि उसे श्रफसोस हो रहा था कि वह क्यों श्राया ? उसने यह बातें स्थिति की थाह लेने के लिए श्रौर यदि हो. सके तो उसे राजेन्द्र को यह लिख भेजा कि भ्रब वह्‌ सम्बन्ध तोड़ दिया जाए और राजेन्द्र ने .. . रहा था, फिर भी इतना तो स्पष्ट ही था कि जो कुछ हो चुका, हो चुका । उसमें... . पीछे लौटने की कोई गुजाइश नहीं मालूम होती थी । राजेन्द्र को इस समय की. `




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