पुरुषार्थसिध्दुपाय प्रवचन | Purusharthsiddhiupaya Pravachan

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Purusharthsiddhiupaya Pravachan by महावीर प्रसाद जैन - Mahaveer Prasad Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गाथा 2 १३ निश्वयनय तो मूताय है शर व्यवह्वारनय श्रभुताय हैं | भूतारथका '्र्य हैं भूत श्र बाला | भूत मायते जो हैं--ऐसे श्रथको जो बताये उसे भूतार्थ कहते हैं। भरमूताथंका धर्थ है-- श्र मायन नहीं, भूत मायत होना । ऐसे धर्थको बताये जो न दो, वह अभूतार्थ है। चस्तु जेसा है, सीधा उसका जो दुशन फराये, उसे निशचयसय कहते हैं श्रौर किसी वस्तुमें बह वात तो नहीं है; पर क्िसीके सम्बन्धसे कोई बात मान! तेना यह न्यवद्वारभय है, घभूतार्थ है । यह सारा विश्व) जगतफे प्राणी मूता कञानते तो वियुख हैं 'भोर श्रभूतार्थकी इष्टिगों झना दिफालसे लगे ही झा रहे हैं अर्थात्‌ व्यवहारमें तो ये जीव झ्नादिसे पगे चते झा रहे हैं, पर निश्वयकी दृष्टि इस जीवकों नहीं हुई, इसी कारण उस व्यवहार इष्टिके विषकों दूर करनमेके लिए, जिसमें यह जीष अनादिसे पगा घला श्रा रहा था, उस दृष्टिविषकों दूर करनेके लिए सिंश्वयनयकों शषधिकतर उपदेश दिया गया है । ~ भूता र श्रमूतार्थका विवरण-- भूतार्थका इदाइरण ऐसा समसिये कि जिस पदार्थमें जो सहज- स्पमाष है, झनादि नन्त शाश्वत्‌ लो पारिशामिक भाव हैं; उसका प्रतिपादन करे बह है भूताथे । झात्मा चेतन्यस्वभावमात्र हैं; शात्मा ज्ञायकस्वरूप है- ऐसी इृष्टियां दिलाना' सो निश्चयनय है घर जो बात , सीधे जिस पदार्थों नहीं है, किन्तु कोई अन्या श्राश्रय करके वात बताए» वह व्यवद्वारतय है ! जेसे ये देव, मनुष्य, तियंच, पशु, पक्षी इन्हें लिरखफर कहते हैं कि ये जीव है तो यह है श्रभूताथ भर्थात्त जो धासो दिख रै बह जीव कहां है * जीव तो किन्हीं भी इन्द्रिय हारा गोचर, नहीं होती । जो इन्द्रि गोचर है, बह सब पोद्गलिक है) श्रज़ीव 8, उसे जीव कहता यह दै शरभा स्यवहारकी बात । सो ऐख ही तो प्रायः करके ल्लोग ऐसा सममा रहे हैं, तभी तो -परस्पर व्यवहार .भी करते हैं । यह जीव हैं), यह मुय है पुष है, आतमा टै, यह है व्यबद्दारकी यत । श व्यवहारनयका त््वते सग्ब्-- भया । व्ययहारनय भौ एङदम अटपट तकौ बोतत दिया जता। तगाव पे, सम्न्ध हो, तथ्य ह, फिर प्रका शराहम्बन तेकर वाना) ष है व्यवहषरलय । लेसे पशु पी को ऐखकर हम कहते हैं यह जीव हैं । स्या उसमें जीव नहीं है १ जीव हैं, पर लौवका जो सदजसखरूप ४ जो जीबके ही सत्ते कारण जीवे शाश्वत्‌ पाया जाता रै) इस रुपमें निरखकर तो नहीं कहा जा रहा यह, झ यह व्यवहार वन गया । कोई व्यवहार होता दै सट्भून, को व्यवहार होता है श्रसदूभूत | जैसे श्रात्मा तो चेतन्यस्वरूपमात्र है। उसे यों सममाना कि जिसमें ज्ञान, हैं, दर्शन है। बढ़ श्रात्मा है; उसे मेद करके सममाना--यह सदुमूत व्यवहार दै श्रौर जेसे इस शरीरकों ऐखकर कहते हैं कि यह जीव है तो यह श्रसदूभूत व्यवद्वार है अथवा जेसे घढ़ेमें थी रखा रहे तो उसे घीका धड़ा फहते दै--यह्‌ घसद्‌- भूतब्यवहार है । प्रारियोंकी भूतार्थवोधविमुखता-- इस जीवने पदार्थकें निरपेक्ष वास्तविक स्वरूपका परिचय तरी किया) इसी फारण सहज स्वरुपकों छोड़कर /झन्य-शन्य रूपोंगें इस जीबने पदाथेका स्वरूप माना है। निश्वयनयसे श्रपने आत्मतत्त्वका परिज्ञान कर लेना--यह वेवनके तो$तेका सपाय दहै । व्यवद्दार तो निश्वयनयके जाननेका उपाय है । व्यवहारे हौ रहना चाहिए। पहिली पहुचीमें निश्वयनयकी बात सुनी भी न चाहिए, जाननी भी न चाहिए । ऐसा प्रमाद अथवा ऐसी बुद्धि स्वयं सोचलो) उस जीवकी उन्नति कष्ट कर सकते बाली होगी । जो परमशरण है। जो वस्तुगत वात हैं; उसको सुनने घोर सममने से भी निरुससाह आरा जाएगा तो फिर किस स्वरूपमें वत्साह किया जाए यह वद्धि पवत बारी-बारी पदार्थोमि ही भटके तो इसको तत्व कद मि्ेगा * झतः बडे प्रयसनोंसे निश्वयकी बातकों समझना




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