केशव - कौमुदी भाग - 2 | Keshav - Kaumudi Bhag - 2

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Keshav - Kaumudi Bhag - 2 by लाला भगवानदीन - Lala Bhagawandin

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(७ ) केचणनदो दो वार लिख डले रह] रामविरक्ति वणन करने मे ( ्वौवीसवँ प्रकाश में ) अपने पांडित्य ॐ प्रकाशन की धुन में लगकर वेमौका उस वणन को बहुत श्रधिक लम्बरा कर दिया है । यहाँ तक कि श्रगर २४ वाँ तथा २५ वाँ प्रकाश इस ग्रन्थ से निकाल लिये जायें, तो भी कथा प्रसंग मे ङं बधान आवैगी, न महाकाच्य में कोई नुदि ही उपस्थित होगी । उन्नीसवे, तीसवे, इकतीसवें चौर बत्तीसवें प्रकाशों में जैसे वणन श्राय है, वे केशवे ही योगब दै, दूसरा कवि शायद इस योग्यता से न कहं सक्ता } ( केशुव का स्थान ) . सव्र वातौ का विचार करे हमारी सम्पति से शब को हिन्दी काव्य संसार मे हिन्दीकाम्याचार्यत्व के लिदाज से सर्वप्रथम स्यान मिलना चाहिये । पर काव्य क्रलाचावुरी के लिदाज्ञ से इनकां वदी स्थान रहेगा जो पहले से चला आता है ग्रथात्‌ वलस शौर सूर के वाद इनका तीसरा नंबर होगा । पर एक वात झ्वश्य कहँँगे कि राग संबंधी व्रात के वर्णन में केशवजी ने उपयुक्त दोनों कवियों से ग्रधिक कुशलता दिखाई है । इसका कारण भी स्पष्ट है | बह यह कि तुलसी श्र सूर राम कृष्णजी के वालस्वरूप के उपासक ये ( राजस्वरूप के नहीं ) श्रीर केशवजी श्रीरामजी के राजस्वरूप के उपासक थे | ( उपसंहार ) केशव के समस्त उपलब्ध ग्रंथ पढ़कर जसा मारी वुद्धिनिणुय कर सकी वैसा निर्सव हमने पाठकों ॐ सामने रख दिया । पाटक केशव के ग्रंथ पढ़ें और जाँचें कि हमारी सम्पति कहा तक ठीक है । ( छृतक्ञतः भरकाशन ) इत टीका की रचना के मुख्य प्रेरक काठियावदि दशान्तर्गत गनौद माम निवासी श्रीमाच उाकुर गोपालर्सिंहनी रामरसिंहजी हैं | आपने केवल प्रेरणा दी नहीं की, वरन्‌ छपवाते समय धन से भी उपयुक्त सहायता की है | मेरे पुराने स्वामी प्रमरबंशावतंस छनपुराणीश श्रीमान्‌ विश्वनाथसिहज्‌. देव ने भी इस दीनः के निवेदन को सुनकर इस उत्तराद्ध भाग के छापाने के हेत उचित रूप से




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