अलंकारचंद्रिका | Alankarchandrika

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Alankarchandrika by लाला भगवानदीन - Lala Bhagawandin

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अधथालंझार १--इ प्मा[* अर्थालड्रारो में सर्वात्तम और अनेक अलझ्जारों का मूल उपमा अलड्भार है । इसी से इसे पहले लिखते रह दोहा-रूप रंग गुन काह को काह के अनुसार । तायों उपया कह्वत हें जे सुबुद्धि आयार || जाकी वरनन कॉजिये सो उपसेय ग्रमान | | 5: जाकी समता दीजिये ताहि कहिय उपसान | उपमसेय रु उपमान में समता जेहि छ्विते होय | मो साधारन घम है कहते सयाने लोग ॥ सो, से, सी, इव, बल, लॉ, सम, समाच उर आन | ज्यों, जैसे, टरगि, सरिस, जिसि, उप्सावाचक्त जान ॥ कहीं-कहीं “रंग, नादे, न्याय ओर मतिन” भी वाचक होते है । विवरण--जब दो वरुतुओं में पृथकता रहते हुए भी कोई समता वर्णन की जाय तब उपमा अलंकार होता हे | समता आकृति, रंग ओर गुण की हानी चाहिये | वर्णन करने में जिसको % अमगरेजी में इस अलंकार को 'सिमिली' ( 51716 ) ओर फ़ारसी तथा उदू में 'तशबीह! कहते हैं




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