आंसू और पसीना | Ashu Aur Pasina

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Ashu Aur Pasina by रामप्रताप बहादुर - Rampratap Bahadur

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about रामप्रताप बहादुर - Rampratap Bahadur

Add Infomation AboutRampratap Bahadur

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
सेलाब वंह गव नदी के किनारे, नदी से लगा इुश्रा, पहले भी था और अब भी है | लेकिन श्रगर सोचिये तो पहले और अब में बहुत श्रन्तर है । यानी पहले उस गाँव में मर्हगू साहु रहते थे श्र अब वे नहीं रहे । मेहगू साहु श्रादसी थे, गाँव न थे । लेकिन फिर भी उस नदी के किनारे, नदी से लगे हुए गॉव को; जिसको आज भी थुन्ही कहते दै, महगू साहु को याद किये बिनान पडते कोई सोच सक्रताथाश्रौरन श्रव सोच सकता है। जब संहगू साहु जीवित थे तब ऐसा था और श्राज जब वे नहीं रहे तब भी ऐसा है। यानी एक समय था जब हम थुन्ही को मंहगू साहु के नाम, धन श्र्थात्‌ आस पास मेँ फैले हुए उनके प्रभाव और दवदबे को स्मरण करके सोचते थे श्मौर ्राज उनके न रहने पर हम थुन्दी को महगू साहू की याद्‌ ताज़ा करके सोचते हैं । देहाती बोलचाल में थुन्ही के मतलब होते हैं थून्दी, श्रथवा वह लम्बी; मोटी श्र मज़बूत लकड़ी जिसको मकानों की दीवारों पर रख कर उसकी कमर के सहारे खपरैल या फूस की छत बिछाते हैं । उसी को जब कुएं पर डाल दिया जाता है तो उसके सीने पर पैर




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now