आंसू और पसीना | Ashu Aur Pasina

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Ashu Aur Pasina by रामप्रताप बहादुर - Rampratap Bahadur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सेलाब वंह गव नदी के किनारे, नदी से लगा इुश्रा, पहले भी था और अब भी है | लेकिन श्रगर सोचिये तो पहले और अब में बहुत श्रन्तर है । यानी पहले उस गाँव में मर्हगू साहु रहते थे श्र अब वे नहीं रहे । मेहगू साहु श्रादसी थे, गाँव न थे । लेकिन फिर भी उस नदी के किनारे, नदी से लगे हुए गॉव को; जिसको आज भी थुन्ही कहते दै, महगू साहु को याद किये बिनान पडते कोई सोच सक्रताथाश्रौरन श्रव सोच सकता है। जब संहगू साहु जीवित थे तब ऐसा था और श्राज जब वे नहीं रहे तब भी ऐसा है। यानी एक समय था जब हम थुन्ही को मंहगू साहु के नाम, धन श्र्थात्‌ आस पास मेँ फैले हुए उनके प्रभाव और दवदबे को स्मरण करके सोचते थे श्मौर ्राज उनके न रहने पर हम थुन्दी को महगू साहू की याद्‌ ताज़ा करके सोचते हैं । देहाती बोलचाल में थुन्ही के मतलब होते हैं थून्दी, श्रथवा वह लम्बी; मोटी श्र मज़बूत लकड़ी जिसको मकानों की दीवारों पर रख कर उसकी कमर के सहारे खपरैल या फूस की छत बिछाते हैं । उसी को जब कुएं पर डाल दिया जाता है तो उसके सीने पर पैर




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