टूटे हुए दिल | Toote Hue Dil

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Toote Hue Dil by रामप्रताप बहादुर - Rampratap Bahadur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपनी सफाई में--- ७ में हिस्सा लेने बाहर से आने वाले साहित्यिकों के ठहरने की जगह है| उसके सामने फूलों की क्यारियों के बीच छोटा सा रास्ता है । रास्ते के किनारे किनारे और एमारत के सामने हज़ारों फूल सेफड़ों ঘুলাপী ক্কী टहनियों पर खिले हुये थे । चार पाँच आदमी खाना खाकर धूप लेने की गरज़ से इस तरफ़ से उस तरफ़ और उप्त तरफ़से इस तरफ़ थदल्ल रहे थे | (बिहारी! जी का कमरा ज़रा ऊँचाई पर है इसलिये वहीं से बैठा बैठा यह दृश्य देख रहा था । थोड़ी थोड़ी देर पर उनके वादविबाद की एकराध क़ियाँ इधर उधर से सुनाई पड़ती | “बिहारी! जी मुझे अपने चन्धे समझाने भे॑ लगे थे | किसी का श्रधकटा वाक्य ता हुआ आाया--“चतुर्धदी जी यदि ऐसा कहते हैं तो क्‍या बेजा' फहते हैं १? “लेकिन वह भूख हड़ताल किये हुये हैं, मर गये तो १?” “मर जाने दीजिये, उनके जीने का क्रिसने ठीका उठाया है!” मैंने ঘীহ से देखा, उस समय उनके कदमों के पास गुल्लाब के जो इज़ारों लाल फूल खिले हुये भे बे मानों मुरका गये हों । “परन्तु टरुडन जी को कितना दुःख होगा!” “भाई, हर बात में टण्डस जी टशडन जी लगाये रहने से क्‍या ज्ञाभ ! जो बात सामने है उसे देखिये | इस समय हिन्दी का द्वित इसी में है कि मेहता साहब ... |” 'विहारी? जी उस समय यह बता रहे थे कि समोलन की परीक्षाश्रों में कितने छात्र भाग 'लेते हैं। किसी ने ऊँचे स्वर में कहा, “इसमें क्या सन्देह प्रान्तीय सरकार की सहामुभूति--1१ उस समय मैंने गुलाओं को देखा वे मुस्कश रहे थे | कम तनखुबाह और इतना काम, 'ब्रिद्वारी! जी करण स्वर में कह रहे थे। उसकी ओर ध्याम देना पड़ा। पिछले शाम की 'उजागर” जी की हिन्दी साहित्यिकों की खींची हुई तस्वीर याद आई। इतने में किसी ने चीध़ कर कहा, “इसी वजह से तो जनता' भिरणई जी की बातें सुनती है, ..।” उत्तर भी सुनाई पढ़ा, “मिरजई जी को छोड़िये, मैंने उन्हें रगढ़ कर रख न दिया तो साहित्यिक न ऋट्टियेगा' |” उस समय सम्मेलन कौ एमारत कौ प्राचीन हिन्दू निर्माण




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