शान्तिपथ | Shantipath

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
224
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( ६
पुत्र पिता प्र ररि सम टूटे, चाहे यह मर जावे ।
पिता पत्र पर रुप होय कर, परसे दूर कराये ॥।
माई भाई लत स्वान सम, हैँ प्राणन् के लेवा ।
धार कषाय उपाधि मच्रै, है दोउ दुःखदेवा ॥१३॥
विधवा नारी पति बिन दुखिया, बिन नारी पतिकोई ॥
क बालाका बद पती हो, दुखित अति मन होई
इष्ठ मित्रका दोय बिछोहा, शोक करत तन छोजे ।
बाल अनाथ न कोउ सहाई, किसका आश्रय लीजे ॥१४॥
कृल कुटुम्बे लोग स्वार्थो, स्वारथ वस दुख देवें।
दाब लगे पर धन संपति स्या, प्राणन तक्र हर लेवं ॥
नृप अन्यायी सव थन छीने, अत्याचारं करं द)
बन्दी गृह मं डार मार फर, सम्पति सबं हः है ॥ १५॥
धरम नाम पर लत अयाने धन लूटें अघतापी ।
मार छेदकर प्राण लेत हर, रक्त बहांवे पापी ॥|
न्यायासन पर बैठ करे अन्याय, घूस कोई लेवे।
दोषीको निर्दोष बतावै, दण्ड सुजन को देवे ॥ १६ ॥
मारे भूटे चोर ठुटेरे, स्याल ब्याल इरया,
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