दिगंबर मुनि | Digambar Muni

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Digambar Muni by डॉ रवीन्द्र कुमार जैन - Dr. Ravindra Kumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १३ 1 श्रत का संरक्षण विस्तार आचार्यो के अत्तिरिवत गृहस्थ रेखक ओर य कवियो ने भी किया है । जिन्होंने मौलिक रचनाओ के साथ अनेक ग्रंथो की टीका और टिप्पण भी लिखे है । जैसे पं० आशाधर जी आदि । इस प्रकार दिगम्बर परम्परा का पोषक मागम साहित्य एसे समयं आचार्यो के हारा समय-समय पर अभिवृद्ध किया गया । श्रमण जीवन की परम्परा अक्षुण्ण बनी रहे और निरन्तर साकार चलती रहे इस संदर्भ मे हमारे श्रुतधराचर्यो द्वारा जो आचार विपयकर ग्रन्थ लिखे गए उनमे श्रमणो के आतरिक ओर वाह्य प्रवृत्तियो का गहराई से वणंन किया गया है । अनेकानेक आचार्यो हासा रचित चरणानुयोग के ग्रन्थो मे विविधे- विविध विषयो पर अनेकानेक आचार्यो द्वारा वर्णन प्रस्तुत्त किया गया है । श्रमणाचार का क्रमिक सागोपाग पर्यारोचन किंसी एक ग्रन्थ विशेष मे देखने को नही मिरता । साघु जीवन की प्रवृत्तियो की जानकारी के लिए हमे अनेकानेक ग्रन्थो का आरोडन करना पडता है 1 प्रसन्नता है दिगम्बर मुनि नामके ग्रन्थ मे श्रमण जीवन, उसकी प्रतिक्षण की क्रिया का क्रमिक ओर सागोपाग सुबोध, सरर, यथावरयक रूप मे वर्णन किया गया है ! परमविदुपी सिद्धन्तवाचस्पत्ति भार्धिका रत्न ज्ञानमती जी द्वारा लिखित दिगम्बर मुनि भ्रन्थ यथात दिगम्बर मुनि की सभी प्रकार की आन्तरिक भौर बाह्य क्रियाभो, कर्तव्यो के स्तुतौ- करण मे अपने आपमे एक प्रामाणिक कोप है यह्‌ ग्रन्थ साधु जीवनके हर पहलुओ ओर प्रत्येक प्रवृत्तियो का पूर्णरूपेण द्पणवत्‌ अवरोकेन कराता है। ग्रथ मे टिप्पणी भौर मूर आचार्यो के ग्रन्थो का सकेत देने से ग्रन्थ की संद्धान्तिक प्रामाणिकता स्पष्ट हुई है । कालक्रम के अनुसार चार्यो का चरिन्नाकन करने से एक प्रबलप्रेरणा का स्रोत इसमे समाहित हो गया । चारो अनुयोगो के परिप्रेच्य मे इस ग्रत्थ का प्रणयन अवद्य मुनि- परम्परा को विशुद्ध रूपेण अक्षुण्ण गति से प्रवाहित करने में पतवार का कार्य करेगा । तथा स्थितिकरण में इस ग्रन्थ से अभूत्तपु्वं प्रेरणा का स्रोत प्राप्त होगा । आधिकारल ज्ञानमती माता जी की अध्यात्म साहित्य सजना उनके ज्ञान के क्षयोपद्ाम की जीवन्त उपलब्धि है। जो कार्य बड़े-बड़े विद्वात्‌ एकनिष्ठ होकर गत अनेक वर्षो मे नही कर पाए वह्‌ आर्थिका- रत की ज्ञानभावतरगिणी से उद्भूत होकर ज्ञान चेतना के क्षेत्र मे एक अभूत पूवं क्रान्ति छा दी ! सस्कृत गौर प्राकृत भाषा के विलष्ट ग्रन्थो




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