तीर्थ - यात्रा | Tirtha - Yatra

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : तीर्थ - यात्रा  - Tirtha - Yatra
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about सुदर्शन - Sudarshan

Add Infomation AboutSudarshan

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
आशीर्वादः १५वै्यजी ने नाडी देखी, माथे पर हाथ रक्वा, ओर फिर कटा-“कोई। चिता नहीं। दवा देता हूँ, बुखार उतर जायमा 1लानवन्ती के डूबते हुए हृदय को सहारा सिल गया। उसने इषट के आंचल से अव्न्नी खोली, ओर वंद्यजी की भेंट कर 'दी। वेद्यजी ने मुंह से “नहीं-नहीं' कहा, मगर हाथों ने मुंह का साथ न दिया, { २कई दिन बीत गये, हेम का बुखार नहीं घटा। वेद्यजी ने कई दवाइयाँ वदलीं; परन्तु किसी ने अपना असर न दिखाया । लाजवन्ती की सचिता बढ़ने लगी। वह रात-रात्तभर उसके सिरहाने बेठी 'रहती। लोग आते और घीरज दे-देकर चले जाते; परन्तु लाजवस्ती का सन उनकी बातो की ओर स था। वह अपने सन को पुरी शक्ति से हेम की सेवा में लगी रहती थी।एक दिन उसने वंद्य से पुछा-'क्या बात है, जो यह बुखार नहीं उतरता ?”बैद्यजी ने एक कदाक्ष-बिशेष से, जो प्रायः वैद्य लोग ही किया करते हे, उत्तर दिया-“भियादी बुखार हं ।“लाजवन्ती ने तड़पकर पूछा-“सियादी बुखार क्या?”“अयनी सियार पुरी करके उतरेगा।”“पर कव तक उतरेगा ?”“इक्कीसवें दिन उतरेगा, इससे पहले नहीं उतर सकता ।”“आज ग्यारह दिन हो श्ये हं 1“बस दस दिन और हे । किसी तरह यह दिन निकाल दो, भगवान भला करेगा।”लाजवन्ती का भाथा ठनका । हिचकिचाते हुए बोली-“कोई अदेसा तो नहीं हं? सच-सच उता दीजिए।”चैद्यजी थोडी देर चुप रहे। इस समय वह सोच रहे थे कि उसे सच-सच वतार्ये, या न वतार्थे ! आखिर बोरे- देखो बुखार दुस्साध्य-सा




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now