चौबीस तीर्थकर - एक पर्यवेक्षण | Chaubis Tirthakar Ek Prayvekshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ 4.)वेदो की उपासना करने वाले ब्रहाचारी साधक 'बाहंत' कहलाते थे ।*४ वाहत ब्रह्म या ब्राह्मण सस्कृति के पुरस्कर्ता थे । वे वैदिक यज्ञ-याग को ही सवशरेष्ठ मानते ये ।आहेत लोग यज्ञो मे विवास न कर कमंवध गौर कर्मनिजंरा को मानते थे । प्रस्तुत आर्हत धमं को पद्मपुराण मे सर्वश्रेष्ठ धमं कहा है 1** इस घमं के प्रवतंकं ऋष मदेव हैं ।ऋग्वेद मे अहंनु को विद्व की रक्षा करने वाला स्वश्रेष्ठ कहा है 1*९शतपथ ब्राह्मण मे मी अहन्‌ का आह्वान किया गया है और अन्य कई स्थलो पर॒ उन्हे शरेष्ठः कहा गया है ।*७ सायण के अनुसार मी अहन्‌ का अथं योग्य है ।श्र तकेवली भद्रबाहु ने कल्पसूत्र मे मगवान्‌ अरिष्टनेमि व अन्य तीर्थकरो के लिए अहत्‌ विशेषण का प्रयोग किया है ।१८ इसिमाषिय के अनुसार मगवानु अरिष्ट- नेमि के तीर्थकाल मे प्रत्येकबुद्ध मी अहत्‌ ' कहलाते थे ।*९पदुमपुराणर ° गौर विष्णुपुराण मे जैनधमं के लिए 'आहेत्‌ धर्म का प्रयोग मिलता है।आहेत शब्द की मुख्यता भगवान्‌ पाइवंनाथ के तीथंकाल तक चलती रही ।* *महावी र-युगीन साहित्य का पर्यवेक्षण करने पर सहज ही ज्ञात होता है कि उस समय '“निम्नेस्थ' दब्द मुख्य रूप से व्यवहृत हुआ है ।*3 बौद्ध साहित्य मे अनेक स्थलो पर भगवान्‌ महावीर को निर्गथ नायपुत्त कहा दै ।२४१४ ऋग्वेद १०।८५।४। १५ आहृतं सवंमेतइच, मुक्तिद्रारमसंवतम्‌ । धर्माद्‌ विमुक्तेरहोऽयं न तस्मादपर परः ॥ -- पद्‌ मपुराण १३।३५० १६ ऋग्वेद २।२३३।१०, २।३।१।३, ७।१८।२२, १०।२।२।, ६६।७) तथा १०।८५।४ ऐ प्रा० ५।२।२, शा० १५।४, १८।२, २३।१ एे० ४1१० १७ ३।४।१।३-६, तं ० २।८।६।६, त° आ० ४।५।७, ५।४।१० आदि-आदि १८ कल्पसूत्र, देवेन्द्र मुनि सम्पादित, सूत्र १६१-१६२ आदि १६ इसिमाषिय १1२० २० पदुमपुराण १३।३५० २१ विष्णुपुराण ३।१८।१२ २२ (क) बाबू छोटेलाल स्मृति ग्रन्थ, पृ० २०१ (ख) अतीत का अनावरण, पृ० ६० २३ (क) आचाराग, १।३।१।१०८ (ख) निर्गंय पावयणं-- --मगवती ६।६।३८६ २४ (क) दीघनिकाय सामञ्जफल सत्त, १८।२१ (ख) विनयपिटक महावग्ग, पृ० २४२




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