जैन - भक्ति काव्य की पृष्ठ भूमि | Jain Bhakti Kavya Ki Prishtha Bhumi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका उपकार-वृत्तिके कारण कभी-कभो ऐसा होता था कि उसका रका नाम पड़ जाता था । भमोपपात्तिक जागम म्रस्थमे चम्पाके एक प्रसिद्ध चैत्यका वर्णन भाया है । उसका नाम 'पूर्णभद्र चेत्य' था। वह यक्ष पूर्णभद्र के नामपर प्रतिष्ठित था । पूर्णभद्र भौर मणिभद्रकी गणना, जिनेन्द्रके प्रथम कोटिके भर्कतोंमें की जाती है । - अतः उसका नाम भले ही पूर्णभद्रचेत्य हो, किन्तु उसमें जिन-मूत्ति नहीं होगी, सिद्ध नहीं होता; भक्त तो वहाँ ही रहेगा, जहाँ उसका आाराध्य हो । जिनेन्द्रके भवतोंमें देवियोंका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रन्थन पद्मावती, अम्बिका, चक्रेश्चरी, ज्वालामालिनी, सच्चियामाता, सरस्वती गौर कुरुकुल्लाका विवेचन किया गया है। बैसे तो अनेक शासनदेवियाँ और विद्यादेवियाँ हैं, ज़िनकी पूजा-भक्ति होती रही है, किन्तु उनमें उपयुक्त सातकी विशेष मान्यता है । उनके सम्बन्धमें अनेक ग्रन्थ यने, मन्दिर-मू्ि्योका निर्माण हुमा भौर स्तुति-स्तवन रचे गये । यहाँ इन सभी दृष्टियोंस उनपर विचार किया गया है। सच्चियामाता हिन्दुओंकी महिषासुरमदिनी थी । वहू महिपोंके रुघिर और मांससे ही तृप्त होती थी 1 एक वार उसे भूख लगी, तो वह श्रो रत्नप्रभमुरिजी के पास पहुँची, उन्होंने उसे जैन बना लिया । सुरिजी विक्रमको १३बीं शतान्दीमें हुए थे। भथत्त्‌ सहिषासुरमर्दिनो जैन देवि सच्चियामाताके रूपमें विक्रमकी १३वीं शताब्दीसे परिणत हुई । उसके पूर्व सच्चियाका अस्तित्व नहीं था । इसी प्रकार कुरुकुल्ला वस्त्रयानी तास्त्रिक सम्प्रदायकी बौद्ध देवी है। वह सर्पोकी देवी कहलाती हैं । एक वार उसने श्री देवसेनसूरिका उपदेश सुना तो जैन वन गयी श्री सुरिजीका समय १२वीं शत्तीका अन्त और तेरहवींका प्रारम्भ माना जाता है। मर्थात्‌ कुरकुल्लाकी जैन मान्यता १३वीं शत्तीसे प्रारम्भ हुई । महापण्डित राहुलने लिखा है, “गया जिलेमें कुरुविहार कुरुकुल्लाविहारका ही परिवर्तित नाम है । आज वहाँके लोग उसे भूल गये हैं । बहुत वर्ष नहीं हुए जव कि वहाँ एक खेतसे कला, पुरातत्त्व भौर मूत्यमें भी अत्यन्त महर सैकड़ों मृत्तियाँ मिली थीं, जो भाज पटना म्युजियममें रखी हैं ।” देवी सरस्वतीकी रूपरेंखाका निर्वाण- कलिकामें उल्लेख गाया है । यह जैनमन्त्रसे सम्बन्धित एक प्रसिद्ध कृति है । इसके रचयिता पादलिप्तसुरि ईसाकी ३री शतीमें हुए हैं। जेन लोग सरस्वती के भवत थे । उन्होंने उसे पवित्नताका प्रतीक माना हैं । उनके भव्ति-भाव केवल स्तत्ति-स्तोचोमे ही नहीं, मनमोहक मूर्तियोंमें भरी विख्रे हुए हैं। वप्पभट्टसूरिकी 'सरस्वती-स्तुति'' अनुपम हैं । उन्होंने एक 'सरस्वतीकल्प' भी बनाया था । यह्‌ ईसाका ८वीं*९वीं ' शतीका समय था । मध्यकालमें १०वींसे १३वीं यातीतक




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