अचल मेरा कोई (सामाजिक उपन्यास) | Achal Mera Koi (Samajik Upanyas)

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Achal Mera Koi (Samajik Upanyas) by सत्यदेव वर्मा बी.ए. - Satyadev Verma B.A.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१२ चल मेरा क्रोई परन्तु दूकानदारीं श्र दूकानों पर जमी हुई या चंचल भीड़ का श्यान उस पर से रिंपट रिपट कर सुघधाकर पर श्रधिक ठहर रद था । वह लखपती घराने का है । लखपती का लड़का जेल गया ! इससे त्रढ़कर स्याग और क्या दो सकता है ! अचल की समभ में बात श्रागई--श्ौर समाज में धनियों की इस प्रतिष्ठा से उसका जी कुद गया । श्रादर सम्मान, विराम विश्राम के लिए धन ज़रूरी है | पर बड़ा कौन है ? सरस्वती और लक्ष्मी की बडी पुरानी लडाई ] किन्तु उल्लू. पर लक्ष्मी की सवारी की कल्पना करते दी उसको सान्त्वना मिल गई--शर किर वह ऐसा दरिंद्र भी न था । उसके घर में भी पैसा था और वह्‌ लेन-देन या किसी ऐसे उपायों से नहीं आया था | स्वास्थ्य उसका अच्छा था । वह सीधा चल रहा था । मार्ग पर उसके पैर फूल की तरह पढ़ रहे थे । सुधाकर की आकृति कुछ अधिक सुन्दर होने पर भी देह उतनी स्वस्थ न थी । यह श्रन्तर तुरन्त उसको एक ऊँचे स्तर पर ले गया, परन्तु उसी चण उसके जी में शनुकस्पा का प्रवाह श्राया ] तुलना ने ग्लानि उत्पन्न की श्रौर उसने भीतर ही मीतर मनाया, सुधाकर का स्वास्थ्य अच्छा हो जाय, उससे इस विधय पर कमी चर्चा करूँगा |? चल ने निश्चय किया, घन को बढ़ाऊँगा । देश के कामों पर खचचे करूँगा, क्यों कि किसी कवि ने ठीक कहा है, “भूखे भगत न देय भुश्रालू ।? जलूस ने समय श्राने पर श्रपनी शक्ति खच करदी श्र सब्र लोग अपनी अपनी घुन में लग गए |




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