प्राकृत साहित्य का इतिहास | Prakrit Sahity Ka Itihas

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutJagdeeshchandra Jain
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
20 MB
कुल पष्ठ :
902
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about जगदीशचंद्र जैन - Jagdeeshchandra Jain
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)विषय-सूचीपहला अध्याय
भाषाओं का बर्गकिरण ३-३र
भारतीय भायभापायें %-१० ,मध्ययुरगान भारतीय श्रायंभाषाथे * ,प्राकृत और सस्कृत ५
प्राकृत और अपगेश ८
प्राकृत भाषार्ये १०-१२
माकृत श्चौर महाराष्ट १२प्राकृत भापाओ कं प्रकार १४-३२पालि ओर श्रशोक कौ धमलिपिया १८ ,भारतेतर आकृत १५
श्रधमागधी १६
शतैरमेनी २०
महाराष्ट्री २४
ब. ८.पशाच २७ ,
मागधी २९ ;दूसरा अध्यायजैन आगम-साहित्य ( ईसवी सन
के पूर भ्वी शताब्दी से
ईसवी सन् की भ्वी शवष्दीतक् ) ३३-१६२
जैन श्रागम ३३
तीन वाचनाय ३९
यम की भाषा २९
प्मागमो ऋ महत्त्व ४१, आगमों का काल ४
द्रादशांग छ४-१०४
श्रायारग ५५' सूयगडग ५१' ठाणाग ५६` मम्वायाग ६१, वियाहपण्णत्ति ६५। नायाधम्मकदा्यो ७५। उवासगदमाश्रो ८५, व्मन्तगडदसाओं ८८
अरणुलरोवचाडयद्माश्रो ९०' पण्टवागरणाषं ९२, विदागमुय ९८' दिटठिवाय ९८। द्वादश्च उपग १८४२२
उचवाइय १०४! रायपसेणइय १०७। जौवाजीवाभिगम १११| प्तवणा ११२। सूस्यिपन्नत्ति ११४जम्बुद्दीवपन्नत्ति ११५। चन्दपञ्चत्ति ११७| निरयावलिया अथवा कप्पिया ११८
कप्पवडसिया १२१
पुश्फिया १२१
पुष्फचूला १२९
वण्डिदसा १२२
User Reviews
No Reviews | Add Yours...