काव्य कल्पद्रुम भाग - 2 | Kavya Kalpadrum Bhag - 2

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Kavya Kalpadrum Bhag - 2 by कन्हैयालाल पोद्दार - Kanhaiyalal Poddar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ए) ध्त्यन्त श्रनुर्त है । किन्तु निद्रा के वशीभूत होकर श्रापने उसको स्वीकार (उसका सत्कार) नदीं किया श्रत श्रापको निद्रासक्त (रलेपाथ-- झन्य नायिकासक्त) देखकर वह ्रत्यन्त विकल दोग, यह तक कि श्राप से उसका जो श्रनन्य प्रेम था उसकी उपेक्ता करके वह खरिटता- नायिका की तरह रप्ट होकर श्रापके निकट से चली गई थी--पर झापके वियोग की व्यथा उससे न सही गई, श्रतएव इस वियोग- च्यथा को दूर करने के लिये श्रापकी सुख-कान्ति का कुछ साइश्य चन्द्रमा में देख कर वह चन्द्रमा को देख-देख कर ही श्रपना मन अब तक चहला रही थी ] किन्तु चन्रमा भी इस समय प्रभात होने पर श्रापके मुख के सादश्य को छोडकर पश्चिम दिशा को जा रहा है । ध्रत्तएव श्रच झ्ापके सादम्य-दर्शन का सनोविनोद्‌ भी उसके लिये श्रद्श्य होगया है-- वह निराश्रित होगई है । कृपया श्रव निद्दा को व्यागकर उस श्रनन्य- शरणा लदमी को सत्कार पूर्वक स्वीकार करियेगा 1 यहाँ राजा झज में नायक के, लक्मी में राजा की प्रियतमा के प्रौर निद्रा राजा की श्रन्यतस नायिका के, '्ारोप में रुपफ श्रलड्लार है। यद्द रूपक, प्रात कालीन निस्तेन-चन्छमा के भग्यन्तर से वणन किये जाने में नो पर्यायोक्ति अलड्टार है, उसका श्रद्ध है । ( ४ ) प्रभातकालीन दृश्य पर महाकवि श्री हर्प का एक उक्ति- वैचिज्य देखिये-- 'वरुणएगरदिणीमाशामसादयन्तम्‌सुं सूची-- निचयसिचयांशांशश्र शक्रमेण निरंशुकम्‌ । वुदिनमदहसं पश्यन्तीव प्रसादमिषादस, निजमुखसित-स्मेर धत्ते हरेमहिपी हरित्‌।' >मेंपघीयचरित १81३ । के घपने नायक को श्रन्य नायिकासक्त जान कर जो कामिनी रुप्ट हो जाती है उसे खणिढता नायिका कहते हैं ।




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