वक्तृत्व कला के बीज 7 | Vakttrva Kala Ke Beej [ Vol - 7 ]

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Vakttrva Kala Ke Beej [ Vol - 7 ] by भैरूदान जी वैद - Bhairudanji Vaidमोतीलाल पारख - Motilal Parakh

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

भैरूदान जी वैद - Bhairudanji Vaid

No Information available about भैरूदान जी वैद - Bhairudanji Vaid

Add Infomation AboutBhairudanji Vaid

मोतीलाल पारख - Motilal Parakh

No Information available about मोतीलाल पारख - Motilal Parakh

Add Infomation AboutMotilal Parakh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
नि हि सर्द प्रथम वि० इ- रस रे दो डए रे इयर हे से आस है ॥ शुरू किया | फिर परी, टू वते अर श डे : उत्वाही युवे ठ गव्ये रे र दण प्गग्देण योग्य दनाया। मुन्त हट षार प्ट सरश, सन्नेषु मनम के जपने वुद्धि वेदन ङ से हरे वि° ०२०५ नुन्न) मङ्गलवार, समान्घ, =>) -यनमुनि 4 प्रपम्‌ ४ पृष्ठ ११६ से १६५ महत्व, ४ शरीर की उपमाए, ७ शरीर का स्वास्थ्य-आरोग्य, ११ १४ रोगी की सेदा, , १४ पथ्य, २० वैद्य, भ्य, २४ चिकित्सा, त्म-सम्बन्धी यनोवी- ३० सोलह्‌-मस्कार, बालकों के निर्माण नको को विगाडने ३७ वालको की ६से २५६ तक “ वृद्ध, ५ वृद्धो न, & जीवन । है रे श्रे प्ठ- ६ कर्तिपय त़ा,२० मृत्यु समय भी




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now