दुनिया का रंग मंच विश्व इतिहास की झलक | Duniya Ka Rang Mach Vishav Itihas Ki Jhalak
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
15 MB
कुल पष्ठ :
322
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)था! किन्तु नाज्यौ इत्तपर भी चन्ुष्ट न हए; उन्होंने साँग आर बढ़ा दी और अपनी
माँगों को पुरा कराने के छिए जर्मन फ़ोज का संचालन थी शुरू कर दिया । इसपर
चेम्परलेन ने स्वयं बीच-वचाव किया । वह हिटलर से मिलने हवाई जहाज से
बचंटेसगेडन पहुंचे और वहाँ उन्होंने हिदलर के अल्टीमेटम को मंजूर कर लिया,
शिससें चेकोस्लोचाकिया के घडे-बडे क्षेत्रों को जर्मनी के हवाले कर देने की माँग की
गई थी । इंसके बाद इंग्लण्ड और फ़ांस ने अपने दोस्त ओर साथी चेकोस्लोचाकिया
को संद अपना अल्टीमेटम भेजा, जिसमें तुरन्त हिटलर को शते मंजूर करने का आदेड
था और यह धमको भी थी कि अगर वहु इसे न मानेगा तो वे उसका क़तई साथ न
देंगे और उससे अलग हो जायेंगे । अपने हो दोस्तों की इस दग़ाबाज़ी से चेक लोग
चकित रह गये; उनको गहरी चोट लगी । येचारे क्या करते ? आलिरकार वडी
व्यया और निराशा के साथ उनकी सरकार ने इस अल्टीमेटम के आगे सिर झुका
दिया । चंम्वरलेन फिर दूसरी वार हिटलर से मिलने गये । इसवार राइन प्रदेश
के गोड्सवर्ग में दोनों को सेंट हुई । वहां चम्बरलेन को पता चला कि अभी
हिटलर बहुत कुछ चाहता हं । चैम्बरलेन तक उन दातों के लिए राज्ी न होसके
और सितम्बर १९३८ के आख़िरो हफ्ते मे युद्ध -संस्ारव्यापी युद्ध--फी काली ओर
गहरी छाया सारे यूरप पर पड़ती दिलाई दी । लोग अपने गेस-रक्षक चोगों को लेने
और वगीचों तथा उपवनों में हवाई हमलों से बचने के लिए खाइयां खोदने को दौड
पड़े । फिर चैम्बरलेन हिटलर के पास गये । इस वार स्यूनिच में मुलाक़ात हुई ।
दलेदियर और मुसोलिनो भी वहाँ गये । फ्रांस और चेकोस्लोवाकिया का मित्र
और साथी सोवियट यूनियन नहीं बुलाया गया और जिस चेकोस्लोवाकिया की किस्मत
का फैसला होने जा रहा था और जो फ्रांस और इंग्लैण्ड का दोस्त था उससे तो
सलाह भी नहीं ली. गई । हिटलर की नई और दूर तक पहुँचनेवाली सगे, जिनके
साथ युद्ध और हमले की धमकी लगी हुई थी, क़रीब-क़रोब पुरी-की-पुरी मंजूर _
करली गई और २९ सितम्बर को इन सब साँगों को शामिल करके 'स्यनिचेका `
का समझौता' तेयार हुआ, जिसपर ऊपर की चारों महाशक्तियों ( इंग्लेण्ड, फ्रांस,
जमनी और इटली ) नें दस्तखत कर दिये ।
फ़िलहाल युद्ध टल गया और सभी मुल्कों के लोगों में इस गहरी मुसीवत से
छुटकारा पाने की भावना फैल गई । लेकिन इसके लिए जो कीमत दी गई वह फ्रांस
भौर इंग्लण्ड की लाज और वेइज्ज्ती की क्रीमत थी । यूरप में प्रजातंत्र को एक
भयंकर धक्का र्गा; चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग हो गया; शान्ति स्थापित करने
के साधन-रूप में राष्ट्रसंघ का खात्मा होगया और मध्य तथा दक्षिण-पुर्वी यूरप में
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