नाग यज्ञ | Naag Yagya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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। 9। शरल-कढ़िनका भेद महीं किया भा सकती, पर मादा सो हिन्दी-उ्ूँ एक दी दे| दोनोंका व्याकरण एक है, क्रियाएँ एक हैं, अधिकांश शब्द शक है, कुछ , 'दिनोंसि संस्कृतवालोंने संस्कृत शब्द बढ़ाने शुरू किये, अरवी-फारलीवालोंनें अरबी-फारलौ सन्द, वख एक भाषाके दो सूप दोगये और इसपर इस छकने रूंगे। हम दया कहें कि सिहर, इसीरर हमारी मिहरबानी' और दयाड्ताका 'दिवाला निकछ गया, प्रेम और मुदब्बतमैंही प्रेम और मुदब्बत न रदी। भाषा तो इसलिये है कि इम अपनी बात दूसरोंको समझा सकें । बोरूने की सफलता तमी है' जब ज्यादासे ज्यादा आदमी दमारी बात समझे। अगर इमारी माषा इतनी कठिन है कि दूसरे उसे समझ नहीं पाते, तो यह हमारे छिये शर्म ओर दुमौग्यकी बात है। जब मैं दिल्ली तरफ जता हूं तव, व्याख्यान रेने सुनने कुछ दर्मसी मादम होने लगती है । क्योकि मष्यप्रान्तनिवासी हेनेके कारण. जौर जिन्दगी भर संस्कृत पदानेके कारण मेरी भाषा इतनी अच्छी अर्थात्‌ सरल नहीं है कि वहाँके मुसलमान पूरी तरह शमझ सकें । इसलिये मैं कोदिश करता हूँ कि मेरे बोलने में ज्यादा संस्कृत शब्द न आने पावें । इस . काममें जितना सफल होता हूँ उतनी ही मुझे खुशी होती है, और जितना नहीं हो पाता उत्तनाददी अपनेको अमागा और नालायक समझता हूँ। मुझे यह समझमें नहीं आता कि लोग इस बातमें क्या बददादुरी समझते हैं कि हमारी माषा कमसे कम आदमी समरे | ऐसा है तो पागलकी तरह चिलाइये, कोई न समझेगा, फिर समझते रहिये कि आप बड़े पंडित हैं । * इरएक बोलनेवालेको यह समझना चाहिये कि बोलनेका मजा ज्यादासे ल्यादा आदमियोंको समझानेमें है । पागल की तरइ बेखमञ्लीकी बातें बकनेमें नहीं | हाँ, सुननेवालोंको भी इतना खयाछ रखना चाहिये कि हो सकता है कि * बोलनेवाला सरठसे सरल बोलनेकी कोदिश कर रहा हो । परं जिन शब्दोंको वह सरल समझ रहा हो, वे अपने छिये कठिन हों। उसका माषा-शान ऐसा इकतरफा हो कि वई ठीक ब्ररहसे हिंदुस्थानी या सरले भाषा न बोल पाता हो। तो इसकी इस बेवशीपर इमें दया करना चाहिये । बिना समझे घमण्डी था ऐसादी कुछ न समझना चादिये। और बातोंमें लड़ाई हो तो समझें आती है। पर भाषामे -लड़ाई दो तो कैसे समझे ! माषासे ही तो हम समझ सकते हैं । इसलिये चाहे छड़ना हो चाहे




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