आयार सुत्त | Aayar Sutt

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
238
श्रेणी :
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उदयचन्द्र जैन - Udaychnadra Jain
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चन्द्रप्रभ - Chandraprabh
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१३.१४१६१७रेट,२०.२१.२२२३रद्वितीय उद्देशकलोक मे मनुप्य पीडित्त, परिजीर्ण, सम्बोचिरहित एव अज्ञायक है ।इस लोक मे मनुष्य व्ययित है 1. तू यत्र-तत्र पृथक्-पृथक् देख । आतुर मनुष्य [ पृथ्वीकायको] दुखदेतेहै।
[ पृथ्वीकायिक ] प्राणी पृथक-पृथक है ।
त उन्दे पृथक-पृथक रज्जमान।हीनभावयुक्त देख ।एसे कितने ही भिक्षुक स्वामिमानपूरवंक कहते है -- 'हम अनगार है ।जो नाना प्रकार कै शस्त्रो द्वारा पृथ्वी-कमं की क्रियाम सलग्न होकर
पृथ्वीकायिक जीवो की अनेक प्रकार से हिसा करते है ।निश्चय ही, इस विषय मे भगवान् ने प्रजञापूवक समाया है ।गौर इस जीवन के लिएप्रशसा, सम्मान एव पूजा के लिए,जन्म, मरण एव मुक्ति के लिएदुखो से छूटने के लिए[ प्राणी कर्म-बन्घन की प्रवृत्ति करता है । ]वह स्वय ही पृथ्वी-णस्त्र ( हल आदि ) का प्रयोग करता है, दूसरों सेपृथ्वी-शस्त्र का प्रयोग करवाता है और पृथ्वी-णस्त्र के प्रयोग करनेवाले
का समथेन करता है ।वह् हिमा अहित के लिए है और वही अवोधि के लिए है ।वह साघु उस हिंसा को जानता हुआ ग्राह्म-मार्ग पर उपस्थित होता है ।शस्त्र-परिज्ञा
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