एक गांव : अनेक युग | Ek Gaon : Anek Yug

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Ek Gawon Anek Yoyg by अज्ञात - Unknown

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about भदंत आनंद कौसल्यायन -Bhadant Aanand Kausalyayan

Add Infomation AboutBhadant Aanand Kausalyayan

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
एक गॉव : अनेक युग {द स्थली है । वै उस पत्यर' पर आरोपित किये हुए अपने देवता की प्रदीपों और पुष्पों से पुजा करते हूं । इस पुना-स्थली पर अथवा उसके पास ही गाडी हुई चार छपरियों पर बनाये हुए प्रदीपाघार में प्रज्वलित, उस' गफा को अपने प्रकाश से अकाशित करनेवाले उस प्रदीप को सच्ध्या के समय उबर से गुजरने वाला कोई भी राही देख सकता है । पपीते के खोल में नारियल का तेल डालकर रोज-रोज इस दीपक को जलानेवाले ग्रामीण जन ही' होते हूं, विशेष रूप से ग्रामीण-नारियाँ। अन्धेरा होते ही कभी कभी कोई ग्रामीण आ पहुंचता है और अपने रोग-ग्रस्त पुत्र के रोग-मुक्त होने की प्रार्थना करता है। कोई स्त्री व्यापार के निमित्त दर गये हुए अपने पति के कुशल- क्षेम की कामना करती है । अपने शत्रु के विनाश कौ किसी ग्रामीण हारा की जानेवाली प्रार्थना उस सड़क से गुजरनेवाले किसी के भी कानमे पड ना सक्ती है । कमी वह गृहणी भी यहाँ दिखाई दे जा सकती है कि जो घुटने टेककर अपनी गौ अथवा अपने आंगन के केले के घवड को चुरा कर ले जानेवाले चौर के स्वेनाश कीः कामना कर रही है। हाँ, और वह, सध्यवयस्का भी जिसे किसी दूसरी स्त्री ने 'बांझ' कह दिया है और जो उस पत्थर पर मिर्च पीस-पीस कर यहीं याचना कर रही है कि उसे वाञ्ल' कटनेवाली स्त्री भी इसी प्रकार पीसी जाय । ऐसी स्त्रियों को जिन्होंने अपनी आँखों देखा है, ऐसे वृद्धनन अभी भी उस गाँव मे है । इस पत्थर के ठीक पीछे--कँडुरु आदि वृक्षों के झुड से भी परली तरफ एक विदल धरः है । उसकी दीवारे ही लगभग दो फुट मोटी ह । पुरानी पड जने के कारण भूरी ही नही काली तक पड गह कटहल की लकडी की चौखंर ओर खिडकी तक भी उस दीवार से वेमेल न होने की चजह से ऊँचाई तथा-आकार प्रकार की दृष्टि से विंाल है, मजबत है । वराम्दे की छत को सिर पर उठाये हुए कटहल की ही लकड़ी के जो खम्मे हूँ, उन्हें छोटी आयु का कोई




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now