पांचवे पुत्र को बापू का आशीर्वाद | Panchave Putra Ko Bapu Ka Aashirvad

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Panchave Putra Ko Bapu Ka Aashirvad by काका कालेलकर - Kaka Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गनोखा सबंध चि कमलनयभकों गाधीजीने समय-समथ पर जो पत्र लिखें हूं उनके अन्दर उसके क्रमिक विकासकी झलक पाई जाती है। छोटी उस्रके पत्र अलग है। सीखोनं जानेका तथ हुआ तवके अलग हे, और उसकी महत्त्वाकाक्षा देखकर ही गावीजी मातापिताकों सलाह देते पाये जाते है। चि कमला, मदालसा और ओम्‌ तीनो मीठी लडकिया है। प्रेमल है। किन्तु तीनों अपने-अपने नमूनेकी स्वतत्र व्यक्तिया हैं। गाधीजी तीनोको अलग-अलग ढगसे प्रेरणा देते हे और उनके विकासमे मददगार होते है। मिठास तो सबसे ज्यादा रामकृष्णकी हैं, लेकिन वह मपनी सस्कारी नम्त्रताके पीछे अपनी स्वतबत्ताको सभाल लेता हैं। यही कारण है कि उसके नाम गाघीजीके खत कम हैं। किन्वु प्रेम और इतजारी सवकी ओर एकसी ही है। जानकोमैयामे आत्म-वि्वास पैदा करतेका काम तो गाधीजी ही कर सके। यहा तक कि जमनालालजीके स्वर्ग॑वासके बाद जो जानकोमैया सती होकर अपने जीवनका अत चाहती थी उनके सिर पर वामूजीने गोमेवाका भार डाला। इतना हौ नही, किन्तु उन्हे उर्दूके हफें सीखने के लिए भी विठा दिया। यह तो गांधीजी ही का काम था। भारतका आत्तरिक इतिहास अगर हम ध्यानसे पढे तो हम देख सकते हैं कि हमारे सष्ट्रके सास्कृतिक घुरघर सवके-सब विद्याल परिवार, याने अविभक्त कुटव पद्धतिके ही कायक थे । “वसुवेव कुटुम्बकम्‌” ही उन सवका आदगं था । हम यह्‌ भौ जानति हं कि आदं कौटुविक सद्गुणोका विकास किये विना, परिवारको परिधि वडाते जाना खतरेसे खाली नही हं । अपनं देकमे हमने अविभक्त कुटव पद्धतिका पुरस्कार करते-करते कई व्यक्तियोके विकासमे वाघा डाली हं ओर चद व्यक्तियोके व्यक्तित्वको कुचल डाला है। कई वार गावीजीने चद व्यक्ियोका नेतृत्व मजवूत करनेके लिए दूसरोके व्यक्तिगत विकास पर अकु रवा हं गौर अगर उन्होने अपने विकासके लिए अलग क्षेत्र नहीं दूढा तो उनका व्यक्तित्व वढनेमे रुक भी गया है। जमनालालजीका तरीका कुछ अलग था। उन्हीके मुहसे मेने सुना है कि जब कभी उन्होंने देखा कि दो व्यक्तियोंके स्वभावमें परस्पर मेल नहीं है तो वे दोनोके लिए अलग-अलग भिन्न-भिन्न क्षेत्र वना देते थे ताकि दोनोकी झाक्तिका पूर्ण विकास हो स्के। यही कारण या १५




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