संस्मरण और आत्मकथाएँ | Sansmarad Aur Aatmkathaayen

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Sansmarad Aur Aatmkathaayen by धुनिराम त्रिपाठी -Dhuniram Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० संस्मरण और आत्मकथाएं नाले के पानी का हकदार, हमारा तालाब रहता आया था । जब किवाड खोल दिए जाते, तो झर-झर कल-कल करता हुआ पानी झरने के समान झरता और नीचे का हिस्सा फेन से भर जाता । मछलियों को उलदी तरफ तेरने की कसरत दिखाने को सूझती । में दक्षिण के बरामदें की रेलिंग पकड़कर अवाक्‌ होकर देखा करता । आख़िर उस तालाब का काल भी आ पहुँचा और उसमें गाड़ियों में भर-भर कर गन्दगी डाली जाने लगी । तालाव के पटत ही देहाती हरियाली का छायावाला वह आईना भी मानों हट मयः । बादामवाला पेड अब भौ खडा ह; लेकिन पर फंलाकर खडे होने की सुविधा होते भी उस ब्रह्मदंत्य का पता अव नही चलता । भीतर और बाहर प्रकाशन बढ़ गया हैं । लकी दादौ के जमाने की थी--काफी लम्वी-चौडी, नवाबी कायदे की । दोनों डण्डें आठ-आठ कहारों के कन्घे की साप के थे । हाथों में सोने के कगन, कानों में सोने के कुण्डल और बरीर पर लाल रंग की हथकट्टी मिरजई पहननेवाले वे कहार भी पुरानी धन-दौलत के साथ उसी तरह लोप' हो गए, जसे इवते हुए सूं कं साथ ही रगीनं बादल । पालकी के ऊपर रगीन लकी रोके कटाव कटे हुए थे । जिसके कुछ हिस्से घिस-घिसाकर नष्ट हो गए थे । जहाँ-तहाँ दाग लगे हुए थे और भीतर के गे में से नारियल के झिरकुट बाहर निकल आए थे । यह मानों इस जमाने का कोई नाम-कहां असबाब था, जो खजाची-खाने के एक कोने में डाल दिया गया था | मेरी उम्र इन दिनों सात-आठ साल को होगी । इस संसार के किन्ही जरूरी कामों में मेरा कोई हाथ नही था और यह्‌ पुरानी पालकी मी सभी जरूरत के कामों से वरखास्त कर दी गई थी । इसीलिये उसपर मेरे मन का इतना खिचाव था । वह मानों समुद्र के बीच का एक छोटा-सा टायू थी और में छुट्टी के दिन का राबिन्सन क्रूसो, जो बन्द दरवाजें में गुमराह होकर चारों ओर की नजर बचाकर बेठा होता ।




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