श्री विष्णु सहस्त्रनाम | Shri Vishnu Sahastranam

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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झशाइरमाष्य १३ प्राणिनां कौतयः यच्चापि खरक्त्या- नुपरवेेन वधंयतोति तम्‌ लोकैरना- ध्यत ॒लोकानुषतापयते शास्त लोकानामीषटट इति बा लोकनाथः तम, मइदू जद्म-विश्वोत्कर्षण वत॑मान- स्वात्‌-महद्‌ मूलं परमार्थसत्यम्‌ सब- भूतानां भवः मंसारो यत्सकादा दुद्धवतीनि सर्वभूतभवेद्रवः ठम ।७॥ ' प्राणियोंकी कीर्ति यानी यशकों उनमें अपनी शक्तिसे प्रविष्ट होकर बदति दहै, जो लोकनाथ अर्थात्‌ कोकोंसे ग्रार्थित अथवा लोकोंको अनुतप्त या शासित करनेवाटे अथा उनपर प्रभुत्व रखने- वाले है, जो अपने समस्त उत्कर्पसे वर्तमान होनेके कारण महद्‌ अर्थात्‌ ब्रह्म तया महदृमूत यानी परमार्थं सत्य ` हैं ओर जिनकी सनिधिमात्रसे समस्त भूतोका उत्पत्ति-स्थान संसार उत्पन होता है, इसलिये जो समस्त भूलकर उद्धवस्थान हैं उन परमेंश्वरका [स्तब्न करनेस मनुष्य सब दु'खोंसे छूट जाता ह ] ॥ज] 0 कट पञ्चमं प्रघ्नं परिदर्ति- अच पांचरें प्रश्नका उत्तर दें हैं- एप में सबधर्माणां धर्मो;घिकतमों मतः । यद्भक्त्या पुष्डरीकाक्ष॑ स्तवेरचेंज्नरः सदा ॥८॥ म द: अ 2 एषः) मे, सत्रधमाणाम्‌) धमः) अधिकतम, मतः । यत्‌, भक्रथा, पुण्डरीकाक्षम, स्तवैः, अर्चेत्‌, नरः, सदा ॥ सर्वेपां चोदनालक्षणानां धर्माणामेप सम्पूर्ण वि्रिरूप धर्मेमिं मैं आगे वक्ष्यमाणो धरमोऽभिकतम इति मे मम॒ तरतठाये जानेवाले इसी धर्मकों सत्रसे अमित्र ~ वड़ा मानता हूँ कि मनुष्य श्री- मतः तः) यद्भक्त्या तात्पयण : हा मा हु क यु पि ' पुण्डरीकाक्षका अर्थात्‌ अपने हृदय- पण्डरीकाशनं हृदयपुण्डरीके प्रकाश्- कम्मे विराजमान भगवान्‌ वा्ुदेवका मानं वामुदवं स्तवेमुंणसकीतेन- ' मक्तिपूर्वक-ततपरतासदित गुणसंक्रीर्तन-




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