छायावादी कवियों के काव्य चिन्तन के सन्दर्भ मे उनके काव्य का अध्ययन | Chhayavadi Kaviyon Ke Kavya Chintan Ke Sandarbh Me Unke Kavya ka Adhyayan

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Chhayavati Kaviyon Ke Kavya Chintan Ke Sandarbh Me Unke Kavya ka Adhyayan by रानी रीता त्रिपाठी - Rani Reena Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अब हम निष्कर्ष सूप में यह कह सकते हे कि धध्वनिकार ने खभी सिद्धान्तों को समावेशित करके जिस ध्वनि सिद्धांत को प्रतिष्ठित किया हे, उसमें उचित सार्थकता देखने को मिलती हे। इस प्रकार इन आचायां ने ध्वनि को काव्य का मूलाधार बताया है। अतः ध्वनि मे न केवल सपूर्णं काव्य -सिद्धात अपितु काव्य रूप आव सम्मिलित है। संस्कत काव्य-चिंतन की परम्परा में कुछ विदान रस को द्री काव्य की आत्मा मानते हें। इसमें प्रमुख भरत व आचार्य विश्वनाथ है। यह सम्प्रदाय सबसे ज्यादा प्रभावशाली रहा। भट्टलोल्लट.. , शंकुक आर अभिनव ने भी इसकी विस्तृत व्यास्याए प्रस्तुत की हे। पंडित राज जगन्नाथ व विश्वनाथ, रस का विवेचन जिस दृष्टि से करते हें, यह उनकी रस के प्रति आसक्रित हे। आचार्य भरत नाट्य शास्त्र मे, वक्रेवितकार वक्रोक्ति विवेचन में, रुद्रट अलंकार में , ध्वनिकार ध्वनि विवेचन में, वामन रीति विवेचन में रस की महत्ता स्वीकार करते हें। आचार्य भरत रस को काव्य का मुख्य आधार बताते हुए कहते हें - न + रसादूते कश्चितदर्थ: प्रवर्तते * ? यानी भरत मुनि काव्य में रस के अतिरिक्त कोई प्रयोजन ही नहीं स्वीकार करते। इनके अतिरिक्त अन्य सम्प्रदाय के आचार्य केवल मानते ही नही, वरन्‌ रस को काव्य का मूल तत्त्व स्वीकार करते हं। आचार्य कन्तक भी इसकी महत्ता को स्वीकार करते हैं। इस विषय में ड0 नगेन्द्र लिखते हे कि - कुम्तक के अनुसार काव्य वक़ोक्ति अर्थात कला हे। इस कला की रचना के लिए कवि शब्द अर्थ की अनेक विभूतय का उपयोग करता हे। अर्थ की -िभूतियां म सबसे अधिक मूत्यवान रस रहै। अतएव रस वक्रोक्ति रूपिणी काव्य का परम तत्त्व है! 20 आचार्य भरत नाट्य शास्त्र में रस विषयक सामग्री का ब्यौरा छठनें व सातवें अध्याय में देते हे। इसके महत्त्व का सम्पादन इन शब्वों में करते हें - सत्व प्रयोजितां हायों प्रयोगो$त्र विराजते, येत्वेते सात्विका भावा नानाभिनयं संखिता: । रसेष्वेतेषु सर्वेतिज्ञया नाट्य प्रयोक्तृभिः । “ आचार्य भोज भी रस को काव्य की आत्मा स्वीकार करते हे। श्रृंगार प्रकाश इसका प्रमुख उदाहरण हे। भोज तो श्रृंगार को सभी रसा का अंगी स्वीकार करते ईहं। रस-सिद्वांत यद्यपि काव्य का केन्द्रीय आधार हे फिर भी यह विविध कछोत्रों में विवादास्पद है। इसकी मुख्य समस्या भाव विवेचन की है। आचार्य भरत भाव शब्द का प्रयोग भावित अर्थ में करते हैं।




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