हिन्दी काव्य पर आंग्ल प्रभाव | Hindi Kavya Pr Angl Prabhav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ५ )पुस्तक 'श्रांग्ल साहित्य का उदू साहित्य पर प्रभावः ( 16 {010९066 0 छाणछापंडा। उिएहा'करप्पा'ह 00. ए१वण उनधला'89पा७ ) में किया है। यह कायं मूलतः एक निबन्ध रूप मे था जो सन्‌ १६२४ मे लन्दन विश्व- विद्या्लय द्वारा पी० एच० डौ° की उपाधिके लिएस्वीकृत हुश्रा था । उस ग्रंथ के प्रकाशन के उपरांत बंगला साहित्य पर पाश्चात्य प्रभाव संवेधी विष्य पर श्रनेक ग्रंथ प्रकाशित किये गए । इस विशेष क्षेत्र मे प्रियारंजन सेन का काये प्रशंतनीय है | उनके निबंध “बंगला साहित्य पर पाश्चात्य प्रभावः ( (४९8४९ {प्प 10 एल्णद्ठभां पतं061'80पा'€) तथा “बंगला नाहित्य का पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में उत्थान श्रौर विकास” (@0रध 31104 1269610107060४ ग 3िढण्क िफला'कपाए6 पाठ8ा' ॥06 1010९०८९ ° एएल्डला (प19ए76 ) क्रमश: सन्‌ १६२४ मैं प्रेमचन्द रायचन्द छात्रबत्ति तथा सन्‌ १४.२६ मे शुबिली रिघन्चं पारितोप्रिक के लिये स्वीकृत करिए गए । थे दोनों निबंध सन्‌ १६३२ में कलकत्ता विश्वविद्या- लय से बंगला साहित्य में पाश्चात्य प्रभाव! ( प्लत [11९6९ 770 3616811 [पला क्पा6) के नाम से सम्मिलित सरूप से प्रकारित्त हुए । वंगल। उपन्यास पर पाश्चात्य प्रभाव के चिपय पर इन्हीं विद्वान लेखक का एक पृथक्‌ लेख “जर्नल श्राफ डिपार्ट मैंट श्राफ लेट्रस,* वाल्यूम २२, कलकत्ता विश्व- विद्यालय में प्रकाशित हुश्रा । फिर बंगला काव्य पर पाश्चात्यं प्रभाव के सम्बन्ध मे एच० एम० दास गप्ता का मंथ श्टूडीज इन वेस्टन इन्फलुएंस श्रान नाइनटीन्थ सेन्चुरी बंगाली पोइट्री' सन्‌ १६३४ में कलकत्त से प्रकाशितश्रा | इसके श्रतिरिक्त इस विपय पर श्रौर भी महत्वपूर्ण लेख “बुलेटिन श्राफ स्कूल श्राफ श्रोरियन्टल स्टीज़, ज्लन्दनः तथा “केलकटा रिव्यू” में समय-समय पर प्रकाशित होइम दिशा मय्यपि बंगना साहित्य पर श्रच्छा कार्य हुश्रा किन्तु हिन्दी साहित्य पर कुछ समय तक संतोषजनक कायं न हो सका | हिन्दी साहित्य पर पाश्चात्य प्रभाव के विपय पर सर्वप्रथम काथं श्रमी हाल में डा० विश्वनाथ प्रसाद सिश्र ने प्रयाग विश्वविद्यालय द्वारा डी० फिल० उपाधि के लिये स्वीकृत श्रपने श्रप्रकाशित सिबंध ' हिन्दी सा दिव्य श्रौर भाषा पर श्रांग्त प्रभाव (१८७० १४ २०) * ( 11811 [01176066 ० सिफिषता 1.8.06 820 पत८७ा80ए76 ) में किया । इसके उपरान्त डा० धर्म किशोर लाल का श्रप्रकाशित निबंध “हिन्दी नाटक पर पाश्चात्य नाटक का प्रभावः ( 106 प्रा 06 06 छि०ड08ा ा 18018 09 141 {78.008 ) प्रयाग




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