ज्वालामुखी | Jwalamukhi

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Jwalamukhi by अनन्त गोपाल शेवड़े - Anant Gopal Shevade

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उवालामुखी श्रायु से पाल-पोस कर बड़ा किया है, जब कि उसके पिता का देहान्त हो चुका था, उसे यह श्राजादी देने में अवश्य ही श्राना- कानी करेंगे । वे शायद जबरदस्ती भी करें -मैजिस्ट्रेट जो ठहरे ! उस ज्ञबरद्रती का मुकाबला करते-करते झगर शादी कर सकना सम्भव न हुआ तो वह श्राजीवन श्रविवाहित ही रहेगी । किन्तु बह श्रपने श्राराध्य के प्रति विश्वासषात हरगिज्‌ नहीं करेगी । लेकिन मैजिस्ट्रेट साहब ने इतनी दुरी तक जिद नहीं की । चार-छुः बार कहा, दो-एक बार होनहार नौकरी-प्राप्त युवकों को श्रपने घर चाय पर बुला कर उसके सामने पेश किया, लेकिन विजया भै उनकी तरफ श्रौल उठा कर भी नहीं देखा । मैजिस्ट्रेट साहब ने कहा, जाने दो, मरने दो, उसकी किस्मत में जो लिखा है, वही होगा । शादी हो जाने के बाद श्रपनी जिम्मेदारी तो क्रम होगी | झमयकुमार उन्हें एकदम नापसन्द हो, ऐसी बात न थी | वह बड़ा स्वस्थ, सुन्दर, गौरवण युवक था, जिसकी सात्विक स्मित किसी के भी मन को मोद लेने की शक्ति रखती थी । साना कि उसकी मँ गरीब है लेकिन इतना पदृ-लिख लेने के बाद वह अपना श्रौर श्रपनी पत्नी तथा माँ का पेट तो चला ही लेगा | लेकिन उनकी नजरों में श्रभव का सबसे बड़ा दोष यहीं था कि वह एक्जिक्यूटिन्ड डिपार्टमेंट में किली श्रोददे पर नहीं था | श्रोर दुसरा यह कि वद्द खद्दर पढ़नता था । . फिर भी झन्त में उन्होंने मन के खिलाफ़ ही सही; विजया और श्रमय के विवाह की झनुमति दे दी | श्र झाज वह विवाह सम्पन्न हो रहा है । विजया के सुख == १८--~




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