व्यवहार और सभ्यता | Vyavahar Aur Sabhyata

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Vyavahar Aur Sabhyata by गणेशदन्त शर्मा 'इन्द्र' - Ganesh Dant Sharma 'Indra'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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घामिक व्यवहार १३ मांगकर अपना ओर अपने बाल-बच्चों का पेट भरना; मौज उडाना कृतघ्न पुरुषों का कामहै । भीखया दान लेकर उसका बदला चकाना ही चाहिए; उपकार करना ही चाहिए १५--घर पर आये भिक्षु को यदि आप कुदं देना उचित नहीं समभते तो उसे कटु शब्दों से सम्बोधित न करो । अपने कुछ नदेनेकी बात उसे नम्रतापुवेंक मीठे शब्दों में कहो । “आगे बढ़ो,' 'यहां कुछ नहीं है,' (कारखाने मे काम देखो, 'हट्टा- कट्टा है, घास का गट्टा बेचो,' “क्या तेरे बाप का देना आता है? क्या कर्जा मांगता है ?' इत्यादि कठोर वचन मत कहो । १६--पागल, बेहोश, कोढ़ी, निर्बल, दीन, हीन, असहाय द को मत छेडो । दुखी को दुख पहुचाना नीच मनुष्यों का काम है । १७--धामिक वाद-विवाद में, पंचायतों में, और दूसरी बातचीत के समय गुस्सा मत आने दो । जोर-जोर से मत बोलो गाली-गलौज न करने लग जाओ। असहिष्णता अधमं है और क्रोध भी पाप की जड है । सभ्यताप्‌वंक बातचीत केरो । धयं मत छोड़ो । लाजवाब होने पर चुप रहो । अण्टशण्ट बातें बकने की शलती न करो । १८--दूसरे धर्म के अनुयायियों को घृणा की हृष्टि से मत देखो । उनके साथ भाई की तरह व्यवहार करो। धमं अलग- अलग होने से मनष्यता मत छोड़ो । धम मनुष्यता छोड़ने की भाज्ञा नहीं देता । जिस धर्में के आप अनयायी हों उसीको सारा जगत माने, यह ज़रूरी बात नहीं है । जितने भी मत-मतान्तर प्रचलित हैं, वे सब अच्छी बातों की नींव पर बने हैं । उनके प्रवत्तक हम साधारण मनुष्यो से उच्च थे । अतएव किसी भी मजहब या मत-पंथ को बुरा न कहौ । कोई भी एेसा मत-पंथ नहीं, जिसमें सभी अच्छी बातें हों या सभी बरी हों । धर्म की प्रतिष्ठा उसके अनुयायियों से बढ़ती है । धर्म के ऊपरी आचरण में रहनेवाले




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