पतिव्रता अरुन्धति | Pativrata Arundhati

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Pativrata Arundhati by जगदीश झा 'विमल'-Jagdeesh Jhaa 'Vimal'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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७ तपारस्म । सन्ध्या दाथ जोडे हई ॑बोखी --“जगत्पिता ! भोपने इस दीनपर कृपां की, इसको दासी अपना सौभाग्य समश्ती है | यदि भाय इस अवला पर प्रसन्न हैं तो मुर्मामा चर दैनैकी छपा कीजिये |“ भगवान--तू अपनी इच्छाक्ते अयुनार जो चाहे माँग सकती है। में तुमपर प्रसन्न हुं; मुहमांगा चर दू'गा। संध्या--पित, ! यदि भाप सेविका पर प्रसन्न हैं तो छुपा कर यह चर प्रदान करें कि मैं संसारकी पत्चिब्रताओंमें स्व श्र प्र रह । स्वप्रमें भी पर पुरुपकी ओर आँख न दोड़े, साथहदी यदि कोई पर- पुरुप चुरे भावले मेरी भर दृष्टि पात करे तो वह उशी लपय नपु सक होजाय | चिष्णु--कल्याणो ! तू जैसा चाहती है वैसा ही होगा | संसारकी पतित्रता नारियोंमें तू सब श्रेष्ठ रहेगी । ख्िर्या तेग पावन नाम लेकर पतिव्रत जैसे गहन मागंमें अग्रसर हो सकेगी । तेरे चताये हुए नियरमोकतो पान्छनकर खियां अपना जीवन सफल करेंगी । अत्यन्त तेजस्वी पति तुमको प्राप्त दोगा । लेकिन इस शरीरे त उनको नहीं पा सकेगी ¡ आपि ध्र ष्ठ॒ मेधातीथि चन्द्र भागा नदीक्षै चिनार य्न कर रहे है, उनके यज्ञम त्‌ अपने इस शरीरकों त्याग कर, तत्‌कालद्दों यज्ञ कुएडसे तेरा दूसरा जन्म होगा । शरीर त्यागति समय तू जिसका ध्यान करेगी दूसरे ज़न्ममें वहीं तेरा पति होगा । संध्या हाथ जोड प्रणामकर घोली-भक्त वत्सर ! ऋषि-यक्षमें




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