गृहणी भूषन | Grahini Bhusan

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Grahini Bhusan by शिवसहाय चतुर्वेदी - Shivsahaya Chaturvedi

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पंडित शिव सही चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले के देवरी नामक गांव में हुआ था | इन्होने कई पुस्तकें लिखीं किन्तु समय के साथ साथ उनमें से कुछ विलुप्त हो गयीं | ये एक अमीर घराने से थे और बचपन से ही कला में रूचि रखते थे |
इनके वंशज आज जबलपुर जिले में रहते हैं और शायद ये भी नहीं जानते कि उनके दादाजी एक अच्छे और प्रसिद्ध लेखक थे | इनके पौत्र डॉ. प्रियांक चतुर्वेदी HIG 5 शिवनगर दमोहनाका जबलपुर में निवास करते हैं |

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(शष्ट); ` म्रीति-पात्र बननेका मुख्य उपाय है,। कुछ भी हो तुम्हें पतिके मनके अनुकूछ बनना चाहिये । पतिका स्वमाव जैसा हो ख्रीको भी चेसा दो स्वभाव रखना उचित है। ऐसा किये बिना उसका मन पाना सअसंमव है । पर तुम यह मत समझना कि यदि स्वामीका स्वभाव निन्दूनीय और चरित्र दूपित हो, तो पत्नीकों मी अपना ससाव और चरित्र वैसा ही रखना चाहिये । यदि स्वामीक़ी आदते बुरी जीर चाट्चटन खरार हो तो जहां तक हो सके उप्तकी आदर्तोका अर चाटचटन सुधारनेका भ्रयत्न॒ करना चाहिये । क्योंकि पति-पत्नींमें एक भाव न होनेते उनमें परस्पर विवाद और चिगाद पैदा हो जानेकी संमावना रहती है । निससे कि पति-पत्नी दोनों दाम्पत्य सुखसे हाथ घो बैठते हैं । इस्त दिये तुम्हें उचित है कि किसी चनावटी उपायका सहारा न छेकर तुम्हें स्वार्मीके मनके अनु+ यू बनना चाहिये। दाम्पत्यप्रणयके अनेकशत्रु खियोंके हृदयमें बात करते हैं; अब इस जगह उनका संसिप्तरीतिसे विवेचन किया जाता है । (१) कुर छियों ऐसी होती हैं कि उन्हें अमिमान बहुत ` प्यारा होता है । वे समझती हैं कि अभिमान न कानेते पतति नित्य नया आदर पाना कठिन है । अतः वे वात वाते अभिमान दिसष्य कर संदेव पति से मानकी मरम्मत कराया करती हैं । यद नये मानक मेम कु शरिटम्व हो ठो उन्हें सर्मान्तिक कट होता है ! और फिर स्वार्माक थोटे दी आद्रको पाकर वे आनन्दे मग्न हो जाती हा `.“ - यह चढ़ा दोप है। इससे स्वामी संतुए न होकर उल्या हो नाता है । अमिमानिनी लियाँ सचे सनेहका मुख नहीं क




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