योगवासिष्ठ: [भाग-3] | Yogvasishtha [Bhag-3]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१ स्मै] : भापाजुवादसदित ् स्फुरन्ति सीकरा यस्मादानन्दस्याइम्वरेघ्वनौ । . सर्वेपां जीवनं तस्मै व्रह्मानन्दात्मने नमः॥ ३॥ तीक्ष्णो काणः कथित्‌ संशयाकृष्टमानम्‌ः । अगस्तेराश्रमं गत्वा युनि प्प्रच्छ सादरम्‌ ॥ ४॥ सतीकष्ण उवाच्‌ भगवन्‌ धर्मतयज्ञ॒ ` सर्वशास्रपिनिश्चित । संशयोऽस्ति `महानेकस्त्वमेतं कृपया यद्‌ ॥ ५॥ इस प्रकार (तत्‌ः ओर प्स पदार्थका योधन करके तटस्थ लक्षण पर्य- यसित होनेवले “आनन्दो ब्रहेति व्यजानात्‌ इत्यादि शिते निर्दट निरतिगय आनन्दरूप परमपुरुपा्थभूत अखण्ड वाक्या्थको नमस्कार करते है--स्फुरन्ति' इत्यादिसे । जिस प्रत्यागासस्वरूप परिपूर्णं निरतिशयानन्द्-मदासमुदरते स्वर आदि छोकोंगें अर्थात्‌ देवतामिं ओर भूमिम अर्थीप्‌ येतनाचेतन सम्पूणं पदाथि न्यूनाभिक- मावसे आनन्दलेशका अनुभव होता है और वास्तवमें जिसका आनन्दलेश जीवोंका जीवन ( आत्मा ) हे, उस परमपुरुपाभमृत ब्रह्मानन्दे रिए नमस्कार है ॥ ३ ॥ यों मंगछाचरणके साथ-साथ विषय आदिका प्रदर्शन करते हुए संक्षेपतः गाखाधका प्रदर्शन किया। अब उसी शास्त्रारथका उपपति आदि विस्तारपूर्वक निरूपण करनेके रिष श्रोताओंके विश्वासकी दृढ़ताके लिए _अन्थकार महामूनि मिष्ट जीर भगवान्‌ समचन्दजीके संवादके आरम्भके पहले उपोदूधातरूप आख्या' और भगवान्‌ रामचन्दजीके संवादके आरम्मके पहले उपोद्धातरूप आख्या 1 कहते है---शुतीक्ष्णो' इत्यादिसे । सुतीक्ष्ण नामका कोई ब्राह्मण था । उसका हृदय अनेक प्रकारके सन्देदोसे मरा था, अतएव उसने महामुनि अगस्तिके आश्रममें जाकर उनसे सादर प्रन किया ॥ ४॥ 7 सुीक्षणने का--भगवन्‌ , आप धर्मक तच्को जानते दै, सम्पूणं शासका आपने भठी भांति मथन किया हे, मुझे एक बड़ा भारी संदाय है, कृपा कर आष उसे दूर कीनिए ॥ ५ ॥ रोनेके वारम हेतु रखता है । निगार न्यूनता और अधिक्ताम “मे टी न्यम या अधिक हैं. रेरा किये. विषयमे ` अभिमानं कटनैते किया कहता है 1 उक्त अर्मे एष दि छा थे मन्त कती योद्धा िन्तानातमा पुस्यः प्राणमेव प्राणौ जाम भवति इ्यादि भरति प्रमाण हे ` पन्ता कर्ता बोद्धा विज्ञानात्मा घुरुप प्राणन्नेव पराणो नाम भवति इत्य




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