भक्तियोग | Bhaktiyog

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भक्ति क्या है ६इतने सुल चेनके सधन दिथे है, इसलिये उसके बदखेमे सुभे. उससे ' प्रेप रखना चाहिये” इत्यादि विचार सच्चे भक्तकै 'हृद्यमें स्थान नहीं पा सकते । संच्चे भक्तको ईश्वरे स्वा अन्य ` किसी भी पदा्थकी थ्लिकुल इच्छा नहीं होती। जो भक्ति भूतकाकिक उपकारो ओर भावी सदिच्छाभंपर अवलं बित रहती है वह कभी अहैतुकी नहीं हो सकती । उसमें खार्थका आभास रहता है! भहैतुकी भक्तिके शब्दसागरमें “बदला” शन्दका अभाव है । एक विद्वानका कथन है “मैं चाहता हूं, कारण कि, में चाहता हं ! तेरे सिवा अन्यकों साहना च एह- यानना मेरा स्वभाव नहीं है।” अहैतुकी भक्तिक्रा यही तात्पर्य है' और भक्तियोगकी यहीं पराकाछा है ।यह तो हुई उत्कष भक्ति । इससे दीन श्रेणीकी भी भक्ति दोती है ययपि वह भक्ति इस संज्ञाके योग्य नहीं; तोभी उच्च भक्तिपर पहुवानेके लिये यह सीदियो$ समान सहायता करती है। इस सोढ़ीपर चढ़ना भी बड़ा कठिन के है! लेकिन तोमी किसीको निराश नहीं होना चाहिए | प्रथम सीदीसे श्ारंभ करके मी अभ्यास भौर अविश्नान्त उद्योग `करनेसे उश्च शेणीपर पहुंच सकते हैं ।मनुष्योंकी उच्च तथा हीन श्रेणीकी शक्तियोंके निय्न लिखित दो भेद हैं--१ रागात्मिका अथवा अहतुकी ( सर्वोत्कष्ट)२ बैघी--स्वाथमय अथवा गौणी ।




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